मकर संक्रांति पर हिमाचल के तीर्थों में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
शिमला, 14 जनवरी (हि.स.)। मकर संक्रांति और माघी पर्व के अवसर पर पूरे हिमाचल प्रदेश में आस्था, परंपरा और प्रकृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। कड़ाके की ठंड के बावजूद प्रदेश के प्रमुख तीर्थ स्थलों में हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान कर पुण्य अर्जित किया। कुल्लू से लेकर शिमला, सिरमौर और बिलासपुर तक धार्मिक स्थलों में दिनभर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही।
कुल्लू जिले के मणिकर्ण में गर्म पानी के कुंडों में आस्था की डुबकी लगाने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। वहीं बिलासपुर जिले के मार्कण्डेय मंदिर क्षेत्र में भी मकर संक्रांति पर बड़ी संख्या में लोगों ने पारंपरिक स्नान किया। ऊपरी शिमला के ठियोग क्षेत्र में स्थित हरिद्वार तुल्य प्रसिद्ध माईपुल तीर्थ में भी श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा, जहां लोगों ने ठंडे मौसम के बीच श्रद्धा के साथ स्नान किया।
सिरमौर जिले में स्थित अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त तीर्थ श्री रेणुका जी में मकर संक्रांति पर विशेष धार्मिक आयोजन हुए। दिनभर मंदिरों में श्रद्धालुओं की कतारें लगी रहीं और विशेष पूजा-अर्चना की गई। हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं के बीच स्थानीय विधायक भी मौजूद रहे। इस मौके पर उन्होंने कहा कि सरकार रेणुका जी तीर्थ को और अधिक विकसित करने के लिए गंभीरता से काम कर रही है, ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।
मंडी जिले में सतलुज नदी के किनारे स्थित प्रसिद्ध तीर्थ तत्तापानी में भी मकर संक्रांति पर खास रौनक रही। शिमला से करीब 56 किलोमीटर दूर इस स्थल पर सुबह चार बजे से ही श्रद्धालुओं का तांता लग गया। भीषण ठंड के बीच प्राकृतिक गर्म पानी के कुंडों में स्नान कर लोगों ने मकर संक्रांति का पुण्य लाभ लिया। यहां ब्रह्म मुहूर्त से शाही स्नान और तुलादान की परंपरा निभाई गई। मान्यता है कि तत्तापानी में स्नान करने से न केवल पुण्य मिलता है बल्कि त्वचा संबंधी रोगों में भी लाभ होता है।
तत्तापानी में खिचड़ी के प्रसाद की परंपरा भी इस दिन विशेष आकर्षण का केंद्र रही। करीब 97 वर्षों से चली आ रही परंपरा के तहत सूद परिवार की ओर से लगभग तीन क्विंटल खिचड़ी श्रद्धालुओं में वितरित की गई। बताया गया कि यह परंपरा उनके पूर्वज बिहारी लाल सूद ने शुरू की थी, जिसे आज भी परिवार निभा रहा है। तत्तापानी की खिचड़ी वितरण परंपरा वर्ष 2020 में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज हो चुकी है।
तत्तापानी का धार्मिक महत्व त्रेता युग से जुड़ा माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार यह क्षेत्र ऋषि जमदग्नि और भगवान परशुराम की तपोस्थली रहा है।
धार्मिक आस्था के साथ-साथ तत्तापानी वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां के पानी में गंधक की अधिक मात्रा पाई जाती है, जो चर्म रोगों के लिए लाभकारी मानी जाती है। कोल डैम बनने के बाद पुराने स्रोत के डूब जाने पर भू-वैज्ञानिकों ने ड्रिलिंग के जरिए नए गर्म पानी के स्रोत खोजे और श्रद्धालुओं के लिए पक्के कुंड बनाए।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा