कानून बनने के बाद उसके असर की समीक्षा जरूरी : कुलदीप सिंह पठानिया

 


शिमला, 17 सितंबर (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने कहा है कि कानून बनाना ही विधायी प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य नहीं है। कानून लागू होने के बाद उसके वास्तविक प्रभावों की समीक्षा करना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसी कानून की सफलता इस बात से तय होती है कि वह अपने निर्धारित उद्देश्यों को कितना पूरा कर रहा है, जनता के जीवन पर उसका क्या असर पड़ा है और उसके क्रियान्वयन में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

पठानिया दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केप टाउन स्थित दक्षिण अफ्रीकी संसद में 69वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कानून लागू होने के बाद उसकी व्यवस्थित समीक्षा से यह पता लगाया जा सकता है कि वह अपने मूल उद्देश्यों के अनुरूप काम कर रहा है या नहीं। इसके साथ ही क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं, प्रशासनिक संस्थाओं के पास उपलब्ध संसाधनों और नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आकलन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसी समीक्षा से उन कमियों की पहचान संभव होती है, जो कानून बनाते समय स्पष्ट नहीं हो पाती हैं। इस विषय पर उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना और हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष हरविंद्र कल्याण ने भी अपने विचार रखे।

पठानिया ने कहा कि संसदीय समितियां कानूनों की समीक्षा की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। समितियां संबंधित मंत्रालयों से आंकड़े और रिपोर्ट मांगने के साथ विशेषज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों, नागरिक समाज, उद्योग जगत और प्रभावित नागरिकों के विचार सुन सकती हैं। इससे कानून की समीक्षा सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहेगी और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के अनुभव भी सामने आएंगे। उन्होंने कहा कि जनता की भागीदारी से समीक्षा प्रक्रिया अधिक सार्थक हो सकती है। नागरिकों को कानूनों के क्रियान्वयन से जुड़ी कठिनाइयों और अपने सुझाव संसदीय समितियों तक पहुंचाने के सरल माध्यम उपलब्ध होने चाहिए। श्रम, शिक्षा, पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा, उपभोक्ता संरक्षण और डिजिटल शासन से जुड़े कानूनों की समीक्षा में नागरिकों के अनुभव विशेष रूप से उपयोगी हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक परामर्श को कानूनों की समीक्षा का हिस्सा बनाया जा सकता है। संसदीय समितियां लिखित सुझाव आमंत्रित करने, सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करने और आवश्यकता के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करने जैसी व्यवस्थाएं अपना सकती हैं। पठानिया ने कहा कि कानून बनने के बाद उसकी समीक्षा लोकतांत्रिक विधायी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जनता से निरंतर संवाद, विधायिका की सक्रिय निगरानी, संसदीय समितियों की प्रभावी भूमिका, विश्वसनीय आंकड़ों और आधुनिक तकनीक के उपयोग से इस प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि सशक्त लोकतंत्र में जनता केवल कानूनों की प्राप्तकर्ता नहीं होती, वह उनके प्रभाव के मूल्यांकन और सुधार की प्रक्रिया में भी सहभागी होती है। कानूनों की समीक्षा और जनता से जुड़ाव विधायी व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी, प्रभावी और नागरिक-केंद्रित बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा