प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी मंडी में अनूठी पहल... कलाग्राम पंजेठी में एम्फी थियेटर की स्थापना
मंडी, 24 अगस्त (हि.स.)। हिमाचल की सांस्कृतिक राजधानी मंडी के पंजेठी में कला की विभिन्न विधाओं को समर्पित कला ग्राम में नव निर्मित ओपन थिएटर लोककला, संगीत, नृत्य एवं अभिनय की आकर्षक प्रस्तुतियों के साथ शुरू हो गया। स्व. टेक चंद्र कपूर के शताब्दी वर्ष पर उनके बेटे और कालरू कायथ फाउंडेशन के संस्थापक प्रो. डा. राकेश कपूर की ओर से यह एम्फ़ीथियेटर अपने पूर्वजों को समर्पित किया गया। इस अवसर पर कला की सभी विधाओं में पारंगत कलाकारों की उपस्थिति उत्साहजनक रही।
कालरू कायथ फाउंडेशन की स्थापना के साथ ही इसके युवा सदस्यों उज्ज्वला कपूर व सुदीप कपूर ने फाउंडेशन का विज़न, उद्देश्य इन्हें किस प्रकार कला, डिज़ाइन, फिल्म माध्यमों से प्राप्त किया जा सकता है।
गौरतलब है कि उज्जवला कपूर युनिवर्सिटी ऑफ एडनबर्ग के एडनबर्ग स्कूल ऑफ़ आर्ट, स्कॉटलैंड, यूके से क्रिएटिव डॉकुमैंट्री में पीएचडी कर रही हैं। वहीं पर सुदीप कपूर नैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ डिज़ाइन अहमदाबाद से स्नातकोतर की पढ़ाई कर रहे हैं। फाउंडेशन की सदस्य एवं मंच संचालक डा. लतेश कपूर ने बताया कि मंडी के साथ लगते इस खूबसूरत कलाग्राम और यहां पर ओपन थियेटर की परिकल्पना फाउंडेशन की युवा सदस्य उज्ज्वला की थी। जबकि डा. राकेश कपूर ने इस सपने को जमीन पर साकार किया है। खुले आसमान के नीचे प्रकृति के आंचल में आयोजित इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसमें न कोई मुख्यअतिथि था और नहीं कोई कार्यक्रम अध्यक्ष, किसी भी तरह की औपचारिक्ता से हटकर इस कार्यक्रम में शामिल हर व्यक्ति अपने आपमें विशिष्ट और खास था। कलाग्राम की स्थापना का आरंभ अपनी तरह से अनूठा रहा। इसमें खुले आसमान के नीचे शास्त्रीय नृत्य,गायन एवं वादन, लोकनृत्य, लोकगाथा, रंगमंच की प्रभावशाली प्रस्तुतियां रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ विद्या की अधिष्टात्री देवी सरस्वती की वंदना संगीत सदन मंडी कलाकारों द्वारा की गई। वहीं लोककलाकार भीष्म की बांसुरी की मधुर धुन से माहौल संगीतमयी हो उठा। तपस संगीत एवम नृत्य अकैडमी की नन्हीं बच्चियों की नृत्य प्रस्तुति गुरु वंदना के रूप में की गई। इसके अलावा लोककलाओं के रूप में मांडव्यकला मंच की प्रस्तुति लोक नृत्य लुड्डी, कृष्णा ठाकुर द्वारा लोकगायन भौरू ,लोक साहित्यकार प्रकाश चंद्र धीमान के निर्देशन में ऐतिहासिक लोकगाथा झेहड़ा गायन एक तरह से अपनी विरासत को सहेजने का अनूठा प्रयास था।
हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा