हिमाचल : सात जिलों में जिला परिषद अध्यक्ष का इंतजार, 35 पंचायत समितियों में भी चुनाव लटके
शिमला, 09 जुलाई (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव संपन्न हुए 38 दिन बीत चुके हैं, लेकिन प्रदेश के कई हिस्सों में स्थानीय स्वशासन व्यवस्था अभी तक पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाई है। राज्य के 12 में से सात जिलों में जिला परिषद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव अब तक लंबित है। वहीं 92 पंचायत समितियों में से 35 पंचायत समितियों को अभी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष नहीं मिले हैं। इसका असर प्रशासनिक कामकाज के साथ-साथ निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के मानदेय, सुविधाओं और विकास कार्यों पर भी पड़ रहा है।
प्रदेश में अभी कांगड़ा, चंबा, ऊना, सोलन, कुल्लू, शिमला और लाहौल-स्पीति जिलों में जिला परिषद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं हो पाया है। केवल पांच जिलों में ही अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुने गए हैं। नियमों के अनुसार जिला परिषद अध्यक्ष को 25 हजार रुपये और उपाध्यक्ष को 19 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है, जबकि जिला परिषद सदस्य को 8,300 रुपये मासिक मानदेय दिया जाता है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का मानदेय उनके चुने जाने की तारीख से लागू होता है। ऐसे में जिन जिलों में अभी चुनाव नहीं हुआ है, वहां निर्वाचित सदस्य केवल सदस्य के रूप में मिलने वाले मानदेय के ही पात्र हैं। अध्यक्ष बनने के बाद ही सरकारी वाहन और अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं। इस समय केवल पांच जिलों के जिला परिषद अध्यक्षों को ही ये सुविधाएं मिल रही हैं।
प्रदेश में कुल 92 पंचायत समितियां हैं। इनमें अब तक 57 पंचायत समितियों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव पूरा हो चुका है, जबकि 35 पंचायत समितियों में यह प्रक्रिया अभी बाकी है। पंचायत समिति अध्यक्ष को 12 हजार रुपये और उपाध्यक्ष को 9 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है, जो उनके निर्वाचन की तिथि से लागू होता है। जिन पंचायत समितियों में अभी तक चुनाव नहीं हुआ है, वहां कोई भी प्रतिनिधि अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के मानदेय का पात्र नहीं बन पाया है। अब तक बिलासपुर में तीन, चंबा में छह, हमीरपुर में एक, कांगड़ा में 13, किन्नौर में तीन, कुल्लू में पांच, लाहौल-स्पीति में एक, मंडी में सात, शिमला में नौ, सिरमौर में चार, सोलन में चार और ऊना में एक पंचायत समिति में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुने गए हैं।
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव लंबित रहने का असर विकास कार्यों पर भी दिखाई दे रहा है। जिला परिषदों और पंचायत समितियों की नियमित बैठकें, विकास योजनाओं की प्राथमिकताएं तय करने की प्रक्रिया, विभिन्न समितियों का गठन और कई प्रशासनिक फैसले प्रभावित हो रहे हैं। इससे ग्रामीण विकास से जुड़े कई प्रस्तावों और योजनाओं के क्रियान्वयन में भी देरी हो रही है।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा