अंडमान-निकोबार मॉडल से हिमाचल में आइलैंड टूरिज्म विकसित करने की दरकार
शिमला, 03 मार्च (हि.स.)। समुद्र के बीच बसा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह हर साल लाखों देसी-विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। वहां पर्यटक क्रूज, शिप और वॉटर मेट्रो जैसी सुविधाओं के जरिए एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक पहुंचते हैं और समुद्री पर्यटन का अलग ही अनुभव लेते हैं। इसी तर्ज पर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में भी आइलैंड टूरिज्म को धरातल पर विकसित करने की जरूरत है।
बिलासपुर स्थित गोविंद सागर झील का विशाल जल क्षेत्र और इसके बीच उभरने वाला ज्योरीपत्तन इलाका पर्यटन की दृष्टि से काफी संभावनाएं समेटे हुए है। यह क्षेत्र साल के आठ से नौ महीने तक पानी से ऊपर रहता है, जो पर्यटन गतिविधियों के लिए अनुकूल माना जाता है। जानकारों का कहना है कि यदि यहां योजनाबद्ध तरीके से सुविधाएं विकसित की जाएं, तो पर्यटकों को पहाड़ों के बीच द्वीप जैसा अनुभव मिल सकता है।
पर्यटन क्षेत्र से जुड़े जानकार कहते हैं कि किसी भी जल पर्यटन स्थल को सफल बनाने के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद जरूरी होता है। अंडमान-निकोबार में द्वीपों के बीच आवाजाही के लिए विकसित वॉटर ट्रांसपोर्ट सिस्टम, आधुनिक जेट्टी, सुरक्षित बोटिंग और हाई-क्लास सुविधाएं पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। वहां एक आइलैंड से दूसरे आइलैंड तक पहुंचने के लिए क्रूज और शिप का सहारा लेना पड़ता है, जो खुद पर्यटकों के लिए बड़ा आकर्षण बन जाता है। वोटिंग और समुद्री सफर का अनुभव पर्यटन को लगातार गति देता है।
हिमाचल में फिलहाल इस तरह की जल परिवहन व्यवस्था सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि गोविंद सागर झील में सुनियोजित वॉटर ट्रांसपोर्ट, आधुनिक बोटिंग प्वाइंट, इको-फ्रेंडली कैंपिंग साइट और नेचर ट्रेल जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं, तो बिलासपुर एक नए पर्यटन गंतव्य के रूप में उभर सकता है। इससे स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और आसपास की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
राज्य में आने वाले अधिकांश पर्यटक अभी शिमला, मनाली और डलहौजी जैसे पारंपरिक हिल स्टेशनों तक ही सीमित रहते हैं। मैदानी इलाकों से आने वाले सैलानी मुख्य रूप से पहाड़ों की ठंडी जलवायु, बर्फबारी और प्राकृतिक दृश्य देखने यहां पहुंचते हैं। ऐसे में यदि बिलासपुर में अंडमान की तर्ज पर वाटर ट्रांसपोर्ट और आइलैंड टूरिज्म विकसित किया जाता है तो पर्यटकों को एक नया विकल्प मिलेगा और पर्यटन का दबाव भी अलग-अलग क्षेत्रों में बंट सकेगा।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल बिलासपुर ही नहीं, बिलासपुर-मंडी सीमा पर स्थित कोल डैम और कांगड़ा जिले के पौंग डैम क्षेत्र में भी वाटर टूरिज्म को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने की जरूरत है। इन जलाशयों के आसपास प्राकृतिक सुंदरता और जल क्षेत्र पहले से मौजूद है। लेकिन पर्यटन सुविधाओं के अभाव में उनकी पूरी क्षमता सामने नहीं आ पाई है।
पर्यटन जानकारों की राय है कि यदि हिमाचल अंडमान-निकोबार के सफल मॉडल से सीख लेकर चरणबद्ध तरीके से मजबूत और सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करे, तो राज्य में झील आधारित पर्यटन की नई पहचान बन सकती है। आने वाले समय में यह पहल बिलासपुर सहित पूरे हिमाचल के पर्यटन उद्योग को नई उड़ान दे सकती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा