बेरोजगार पत्नी और चार साल के बच्चे के लिए 7,500 रुपये गुजारा भत्ता ज्यादा नहीं: हिमाचल उच्च न्यायालय
शिमला, 14 सितंबर (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने गुजारा भत्ता से जुड़े एक मामले में कहा है कि बेरोजगार पत्नी और चार साल के बच्चे के लिए 7,500 रुपये प्रति माह की कुल राशि किसी भी तरह से अधिक नहीं मानी जा सकती। अदालत ने कहा कि मौजूदा समय में इस राशि से बच्चे की पढ़ाई, उसकी बुनियादी जरूरतों और जीवनयापन का खर्च उठाना आसान नहीं है। न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल और न्यायमूर्ति योगेश जसवाल की खंडपीठ ने पति की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
मामले में मंडी के प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत पत्नी और उसके नाबालिग बच्चे के पक्ष में कुल 7,500 रुपये की मासिक रखरखाव राशि मंजूर की थी। इसमें चार हज़ार रुपये पत्नी और 3,500 रुपये बच्चे के लिए तय किए गए थे। पारिवारिक न्यायालय ने इसके अलावा मुकदमे के खर्च के लिए आठ हजार रुपये देने का भी आदेश दिया था। इसी आदेश को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पत्नी की ओर से आरोप लगाया गया था कि बच्चे के जन्म के समय उसके ससुराल पक्ष से कोई भी उसे देखने नहीं आया और बच्चे के जन्म से जुड़े सभी खर्च उसके माता-पिता ने उठाए। बाद में पति के परिवार ने उसे वापस ससुराल ले जाने से मना कर दिया। इसके बाद वह मानसिक तनाव के कारण अपने पिता के घर रहने को मजबूर हुई। पत्नी के पास वर्तमान में आय का कोई साधन नहीं है और वह अपने माता-पिता पर निर्भर है।
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि बच्चा अब चार साल का हो चुका है और स्कूल जाने लगा है। इससे उसकी पढ़ाई और अन्य जरूरतों का खर्च बढ़ना स्वाभाविक है। अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में पत्नी और बच्चे के लिए तय 7,500 रुपये की मासिक राशि अधिक नहीं है। अदालत के अनुसार पत्नी के पास अपनी आय का कोई साधन नहीं होने और बच्चे की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए यह राशि उनके जीवनयापन के लिए जरूरी है। खंडपीठ ने इन परिस्थितियों में पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा