लाहौल-स्पीति की घेपन झील में लगा हाईटेक अर्ली वार्निंग सिस्टम, खतरे के संकेत मिलते ही मिलेगा अलर्ट

 

शिमला, 17 अक्टूबर (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति में समुद्र तल से करीब 13,450 फुट की ऊंचाई पर स्थित घेपन झील में ग्लेशियर झील से बाढ़ के संभावित खतरे की निगरानी के लिए अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है। सी-डैक पुणे की मदद से लगाए गए इस सिस्टम के जरिए झील में होने वाले बदलावों पर नजर रखी जाएगी। खतरे के संकेत मिलने पर संबंधित अधिकारियों के मोबाइल फोन पर अलर्ट भेजा जाएगा।

राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के निदेशक एवं विशेष सचिव डॉ. पुष्पेंद्र राणा ने बताया कि इस सिस्टम में तीन स्वतंत्र और एक-दूसरे से जुड़ी यूनिट्स हैं। उन्होंने इसे तीन यूनिट्स और सुपरकंप्यूटर आधारित विश्लेषण वाला देश का पहला अत्याधुनिक एकीकृत सिस्टम बताया। किसी एक यूनिट को नुकसान पहुंचने पर बाकी दो काम करती रहेंगी। बादल छाए रहने की स्थिति में भी ये यूनिट्स 15 से 20 दिन तक काम कर सकती हैं।

उन्होंने बताया कि झील के भीतर सेंसर और जीपीएस ट्रैकर लगाए गए हैं, जो पानी में होने वाली हलचल की जानकारी देंगे। सामान्य स्थिति में हर 10 से 15 मिनट में डेटा मिलेगा, जबकि आपात स्थिति में कुछ ही सेकंड में सूचना उपलब्ध हो सकती है। झील के किनारे स्थापित स्वचालित मौसम केंद्र करीब 14 पर्यावरणीय मानकों को रिकॉर्ड करेंगे। सिस्टम में दो कैमरे भी लगाए गए हैं, जो झील में होने वाले बदलावों पर नजर रखेंगे। बड़े हिमस्खलन या असामान्य तेज आवाज को रिकॉर्ड कर संभावित खतरे के संकेतों का आकलन करने में भी मदद मिलेगी।

डॉ. राणा के अनुसार तीनों यूनिट्स से मिलने वाले डेटा का सी-डैक के सुपरकंप्यूटर में विश्लेषण किया जाएगा। खतरे के संकेत मिलने पर अधिकारियों को अलर्ट भेजा जाएगा, जिससे आपदा प्रबंधन तंत्र को समय रहते सक्रिय करने में मदद मिलेगी।

उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश में केंद्र और राज्य सरकार की ओर से चिन्हित ग्लेशियर झीलों की निगरानी की जा रही है। हाई-रिजॉल्यूशन रिमोट सेंसिंग डेटा से झीलों में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जा रहा है। सिक्किम में इस तरह के सिस्टम का परीक्षण हो चुका है, जबकि उत्तराखंड में भी स्वदेशी तकनीक पर आधारित सिस्टम स्थापित किया गया है। हिमाचल की अन्य तीन चिन्हित ग्लेशियर झीलों पर भी ऐसे सिस्टम लगाने की योजना है।

आपदा से 3,525 करोड़ रुपये का नुकसान

डॉ. राणा ने बताया कि प्रदेश में आपदा से विभिन्न विभागों को हुए नुकसान का आकलन करीब 3,525 करोड़ रुपये किया गया है। इसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी गई है। नुकसान का बड़ा हिस्सा ग्रामीण सड़कों, पुलों, बिजली की लाइनों और रास्तों को पहुंचा है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के अधिकारियों ने पांच से छह जिलों में आपदा प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया है। राज्य सरकार को उम्मीद है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जल्द आवश्यक धनराशि उपलब्ध कराने पर निर्णय लेंगे, जिससे क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे की मरम्मत और पुनर्निर्माण शुरू हो सकेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा