शिमला में एफटीए के विरोध में प्रदर्शन, संयुक्त किसान मोर्चा ने दी आंदोलन की चेतावनी
शिमला, 22 जुलाई (हि.स.)। संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर बुधवार को शिमला में हिमाचल किसान सभा ने भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के विरोध में जिलाधीश कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया।
प्रदर्शन को संबोधित करते हुए हिमाचल किसान सभा के राज्य सदस्य और कसुम्पटी किसान सभा के अध्यक्ष जय शिव ठाकुर, सीटू के प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा और कोषाध्यक्ष जगत राम ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते का मसौदा तैयार हो चुका है और इस पर कभी भी सहमति बन सकती है। उन्होंने दावा किया कि यह समझौता लागू होने पर भारतीय खेती और किसानों के हित प्रभावित होंगे।
वक्ताओं ने कहा कि अमेरिका, यूरोपीय देशों और न्यूजीलैंड में कॉरपोरेट खेती का मॉडल है, जहां खेती से बहुत कम लोग जुड़े हैं और किसानों को अधिक सरकारी सहायता मिलती है। उनके अनुसार भारत में बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और यहां किसानों को प्रत्यक्ष रूप से पर्याप्त अनुदान नहीं मिलता। उन्होंने आरोप लगाया कि कृषि क्षेत्र में मिलने वाली सहायता का लाभ बड़ी कंपनियों को अधिक पहुंच रहा है।
प्रदर्शनकारियों ने यह भी दावा किया कि प्रस्तावित समझौते के तहत भारतीय उत्पादों पर अमेरिका और अन्य देशों में अधिक शुल्क लगाया जाएगा, जबकि भारत में विदेशी उत्पादों पर कम शुल्क रहेगा। उनका कहना था कि इससे कपास, बासमती चावल, फल, दुग्ध उत्पाद, कपड़ा, रसायन, जेनेरिक दवाओं और मसाले, चाय, कॉफी, नारियल तेल, काजू, फल तथा सब्जियों जैसे कृषि उत्पादों पर असर पड़ सकता है।
वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2014 में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का वादा किया गया था, लेकिन वह पूरा नहीं हुआ। उन्होंने तीन कृषि कानूनों का भी जिक्र करते हुए कहा कि किसानों के लंबे आंदोलन के बाद केंद्र सरकार को उन कानूनों को वापस लेना पड़ा था। उनका आरोप था कि अब मुक्त व्यापार समझौते के जरिए किसानों के हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा और अखिल भारतीय किसान सभा के आह्वान पर देशभर में इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। उनके अनुसार 29 जुलाई को दिल्ली में किसानों, मजदूरों और आम लोगों के अगले आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
वक्ताओं ने केंद्र सरकार की आर्थिक और कृषि नीतियों की भी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 12 वर्षों में मेहनतकश वर्गों के हितों की अनदेखी हुई है और आर्थिक असमानता बढ़ी है। उन्होंने दावा किया कि देश की बड़ी संपत्ति कुछ चुनिंदा उद्योग समूहों के पास केंद्रित हो गई है, जबकि बड़ी आबादी के पास बहुत कम संसाधन हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा