मंडी के थाची में देव संस्कृति का अनूठा समागम, मुखौटेधारियों ने उजाड़ डाली अशोक वाटिका
मंडी, 16 अप्रैल (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश की सराज घाटी के अंतर्गत मंडी जिला के थाची क्षेत्र में प्राचीन देव परंपराओं और अटूट आस्था का प्रतीक 'फागली उत्सव' हर्षोल्लास के साथ शुरू हो गया है, जहाँ नौ दिनों तक देव संस्कृति की अनूठी छटा बिखरेगी। इस उत्सव का मुख्य आकर्षण मुखौटेधारी कारकूनों द्वारा रामायण के प्रसंगों का सजीव चित्रण है, जिसमें विशेष रूप से बानर सेना द्वारा अशोक वाटिका को उजाड़ने और लंका पर धावा बोलने के दृश्य को स्वांग के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, जो स्थानीय लोगों के लिए मनोरंजन के साथ-साथ गहरी आध्यात्मिक महत्ता भी रखता है। ये पर्व बुराई पर अच्छाई का संदेश देता है। जहां आसुरी शक्तियों को दूर भगाकर देव शक्तियों के माध्यम से जनता को सुख समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
मान्यता है कि जब रामायण लिपिबद्ध नहीं थी, तब इन्हीं पारंपरिक आयोजनों और अभिनय के माध्यम से रामायण के प्रसंगों को जन-जन तक पहुँचाया जाता था, जिसमें आगे-आगे लंका का नक्शा लिए एक पात्र चलता है और पीछे-पीछे पूरी बानर सेना प्राचीन वेशभूषा में नृत्य करती हुई निकलती है। देवता बिठू नारायण और माता लक्ष्मी के स्वरूप के रूप में ये मुखौटेधारी हर घर जाकर ग्रामीणों को दर्शन देते हैं, जहाँ उनके आगमन पर चूल्हे की राख उखाड़कर फेंकने की एक विशिष्ट रस्म निभाई जाती है जिसे देवता का साक्षात आशीर्वाद माना जाता है। इस दौरान पूरा क्षेत्र मेहमाननवाजी के रंग में सराबोर रहता है, घरों में पारंपरिक पकवान बनते हैं और महिलाओं व युवाओं में इस उत्सव को लेकर भारी उत्साह देखा जाता है।
देवता बिठू नारायण के 90 वर्षीय पुजारी ओत राम शर्मा के अनुसार, यह प्रथा सदियों पुरानी है जो कभी नौ वर्षों तक चलती थी, फिर समय के साथ सिमटकर नौ दिनों की रह गई है। फागली का यह पर्व न केवल प्राचीन संस्कृति के संरक्षण का माध्यम है, बल्कि यह देव शक्ति और मानवीय भक्ति के उस मिलन का प्रतीक है जहाँ देवता स्वयं मुखौटेधारियों के रूप में आकर अपने हरियानों (अनुयायियों) के कष्ट दूर करते हैं। इस नौ दिवसीय उत्सव के दौरान पूरी सराज घाटी पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन और देव कारिंदों के नृत्य से गुंजायमान रहती है, जो आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने की एक जीवंत मिसाल पेश करती है। वीरवार को ये फागली दल बटबाड़ा गांव पहुंचा जहां माता लक्ष्मी और नारायण के मंदिर प्रांगण में एक कटे हुए पेड़ को खड़ा कर कई स्वांग कलाकारों ने किए। जिसको देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ी।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा