हिमाचल में बादल फटने की घटनाओं का होगा वैज्ञानिक अध्ययन, मुख्यमंत्री ने दिए विस्तृत शोध के निर्देश
शिमला, 09 मई (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश में मानसून सीजन में हर साल बादल फटने से जान-माल का भारी नुकसान होता है। प्रदेश सरकार अब बादल फटने की घटनाओं के कारणों का अध्ययन करवाएगी। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने लगातार बढ़ रही बादल फटने की घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन के निर्देश दिए हैं। शुक्रवार देर शाम शिमला स्थित हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में मुख्यमंत्री ने हिमालयन सेंटर फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड रेजिलिएंस की ओर से चलाए जा रहे आपदा जोखिम न्यूनीकरण और अनुसंधान कार्यों की समीक्षा की।
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि हिमाचल प्रदेश में बार-बार हो रही बादल फटने की घटनाओं का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। इस अध्ययन में बांधों के प्रभाव, तापमान में बदलाव, भौगोलिक परिस्थितियों और हिमालयी क्षेत्रों में हो रही घटनाओं के एरियल डिस्टेंस आधारित विश्लेषण को शामिल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य में इन घटनाओं से लगातार जान-माल का नुकसान हो रहा है, इसलिए इनके कारणों और स्वरूप को वैज्ञानिक तरीके से समझना जरूरी है।
बैठक में मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आपदा से जुड़े सभी राज्य स्तरीय अनुसंधान, खतरा आकलन और तकनीकी अध्ययन अब हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के इसी सेंटर के माध्यम से संचालित किए जाएंगे। उन्होंने हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को सेंटर की क्षमता बढ़ाने और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए छह करोड़ रुपये जारी करने के निर्देश दिए। इसके अलावा संस्थागत सुदृढ़ीकरण और क्षमता विस्तार के लिए 10 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मंजूरी भी दी गई।
मुख्यमंत्री ने ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियर झील फटने से जुड़ी घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भी एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की। उन्होंने सेंटर को और मजबूत बनाने के लिए अतिरिक्त विशेषज्ञों और पेशेवरों की भर्ती के निर्देश भी दिए, ताकि तकनीकी और वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता को बढ़ाया जा सके।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में आपदा जोखिम न्यूनीकरण और त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था को मजबूत बनाने में इस सेंटर की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि इस तरह के वैज्ञानिक अध्ययन राज्य के अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में भी किए जाने चाहिए ताकि भविष्य में आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
बैठक में राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि भूस्खलन और ग्लेशियर से आने वाली बाढ़ के मामलों में बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता कम करने के लिए राज्य की तकनीकी और वैज्ञानिक क्षमता को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने सेंटर की ओर से तैयार की जा रही डीपीआर और तकनीकी अध्ययन की सराहना की।
बैठक के दौरान मंडी जिले के थुनाग क्षेत्र के लिए तैयार हाइड्रोडायनामिक मॉडल की प्रस्तुति भी दी गई। इसमें फ्लैश फ्लड के प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन, आपदा आधारित योजना और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर जानकारी दी गई।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा