नाहन के इस गांव में 5 पीढ़ियों बाद मना रक्षाबंधन, एक बछड़े ने बदल दिया 250 साल पुराना इतिहास

 




नाहन, 29 अगस्त (हि.स.)।सिरमौर जिले के नाहन स्थित आम्बवाला गांव की फिज़ा में इस बार रक्षाबंधन का पर्व एक अलग ही एहसास लेकर आया। एक ऐसी लोक-धारणा, जो ढाई शताब्दियों और पांच पीढ़ियों से गांव के राजपूत परिवारों के चेहरों से राखी की रंगत छीन चुकी थी, वह एक ही पल में आस्था और उल्लास में बदल गई। लगभग 250 वर्षों से जिस त्योहार पर सन्नाटा पसरा रहता था, वहां इस बार देर रात तक ठहाके गुंजायमान रहे और खुशियों के दिए जले।

दरअसल, आम्बवाला के चौहान कुनबे में करीब ढाई सौ साल पहले रक्षाबंधन वाले दिन ही एक अनहोनी घटी थी, जिसने परिवार के किसी सदस्य को उनसे सदा के लिए छीन लिया। उस समय के बुजुर्गों ने गम में इस त्योहार से दूरी बना ली। धीरे-धीरे समय बीता और यह फैसला एक ऐसी अटूट परंपरा बन गया जिसे आने वाली पीढ़ियों ने भी ढोया। 80 साल के बुजुर्गों तक ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी बहनों को भाइयों की कलाई चूमते या राखी बांधते नहीं देखा था। बहनों को शादी के बाद राखी पर मायके जाना पड़ता था क्योंकि ससुराल में इस पर्व को मनाना वर्जित था। गांव की पुरानी आस्था कहती थी कि जब तक रक्षाबंधन के ही दिन कोई नई जिंदगी—चाहे वह घर का चिराग हो या फिर कोई बेज़ुबान जीव—आंगन में कदम नहीं रखेगी, तब तक यह बंदिश नहीं टूटेगी।

और आखिरकार, वह ईश्वरीय संयोग इस बार रक्षाबंधन की शाम चार बजे बन ही गया। गांव के वयोवृद्ध रणबीर चौहान की गाय ने एक बछड़े को जन्म दिया। जैसे ही यह खबर फैली, गांव में एक अजीब सी हलचल और भावुक खुशी दौड़ गई। माना गया कि विदा हुई पुरानी आत्मा ही घर में वापस लौट आई है। इस ऐतिहासिक पल की याद को हमेशा के लिए संजोने के लिए उस नवजात बछड़े का नाम ही ‘बंधन’ रख दिया गया।

इसके बाद तो जैसे खुशियों का सैलाब आ गया। जो बहनें मायके में थीं, उन्होंने बिना वक्त गंवाए राखियां भिजवाईं। परदेस में बैठे भाई गाड़ियों की चाबी उठाकर गांव की तरफ दौड़ पड़े। चंडीगढ़ में रहने वाले सचिन चौहान जैसे कई युवा सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके अपनी बहनों से मिलने पहुंचे। शाम को शुरू हुआ राखी बांधने का सिलसिला देर रात 12 बजे तक चलता रहा।

जिन हाथों में पीढ़ियों से राखी की डोर नहीं सजी थी, जब वहां रेशम के धागे बंधे तो घर के बुजुर्गों की आंखें भी नम हो गईं। उत्सव के बाद पूरे परिवार ने आम्बवाला स्थित माता बालासुंदरी के दरबार में जाकर मत्था टेका और आशीर्वाद लिया। आम्बवाला के लिए यह दिन सिर्फ एक त्योहार का लौटना भर नहीं था, बल्कि पीढ़ियों पुराने किसी जख्म के भर जाने का जश्न था।

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हिन्दुस्थान समाचार / जितेंद्र ठाकुर