सोनीपत:सनातन संस्कृति और सभ्यता का गौरव सात समंदर पार भी जीवंत : दविंदर स्वामी

 


-मुरथल में पुर्तगाल से आए अंतरराष्ट्रीय

सूर्यवंशी अखाड़ा परिषद के पीठाधीश्वर का गरिमामय स्वागत

सोनीपत, 22 अक्टूबर (हि.स.)। सनातन

संस्कृति और भारतीय सभ्यता का गौरव सात समंदर पार भी जीवंत है। विदेशों में रहने वाले

लोग भी भारतीय परंपराओं, आध्यात्मिक विचारों और वैदिक संस्कृति से जुड़कर अपनी जड़ों

को मजबूत कर रहे हैं। यह बात पुर्तगाल से आए अंतरराष्ट्रीय सूर्यवंशी अखाड़ा परिषद

के पीठाधीश्वर अनंत विभूषित आचार्य महामंडलेश्वर दविंदर स्वामी सूर्यवंशी ने मुरथल

में कही। गुरुवार को महामंडलेश्वर सीताराम सूर्यवंशी ने उनका गरिमामय स्वागत किया।

इस अवसर पर माता जय श्री जी, ब्राजील से आए महंत प्रदीप कुमार, महंत संजय कुमार, मनीष,

सतीश, यशपाल, जतीन और अधिवक्ता तान्या सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

दविंदर

स्वामी सूर्यवंशी ने कहा कि सनातन संस्कृति किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है।

इसकी शिक्षाएं मानवता, सेवा, सदाचार और आपसी भाईचारे का संदेश देती हैं। यूरोप में

भी सनातन धर्म के प्रति आस्था बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय सूर्यवंशी अखाड़ा परिषद के

माध्यम से वहां भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं और वैदिक विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास

किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में यूरोप में अध्यात्म का नया सवेरा

देखने को मिलेगा। जहां धरती और पानी से जुड़ी सभ्यताओं का विस्तार हुआ, वहां भी सनातन

संस्कृति का प्रकाश फैल रहा है।

उन्होंने

बताया कि पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन के साकावेम क्षेत्र में स्थित आश्रम भारतीय संस्कृति

और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र है। यहां पूजा-पाठ, मंत्र जाप, ध्यान और प्राणायाम

के माध्यम से लोगों को मानसिक शांति और संतुलित जीवन का संदेश दिया जाता है। आश्रम

में भगवान शनिदेव और भगवान महाकाल की आराधना के साथ कर्मों की महत्ता, ईमानदारी और

जरूरतमंदों की सेवा पर जोर दिया जाता है।

दविंदर

स्वामी ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि अच्छे कर्म करना, दूसरों

के अधिकारों का सम्मान करना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना भी धर्म का हिस्सा

है। सनातन परंपरा का मूल संदेश पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की भावना है। इसी विचार

के आधार पर अलग-अलग देशों और समुदायों के लोगों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने

पर्यावरण संरक्षण, जल बचाने और पौधे लगाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, प्रकृति

का सम्मान भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण पहचान है। आधुनिक जीवन में भौतिक सुविधाओं

के साथ मानसिक शांति और नैतिक मूल्यों का होना भी जरूरी है।

मुरथल

में हुए इस स्वागत कार्यक्रम के दौरान सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार और भारतीय परंपराओं

को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने के विषय पर विचार साझा किए गए। वक्ताओं ने कहा

कि विदेशों में भारतीय संस्कृति से जुड़ी धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियां नई पीढ़ी

को अपनी परंपराओं से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / नरेंद्र शर्मा परवाना