सोनीपत के निफ्टेम ने विकसित की मिलावट जांच किट, रंग बदलते ही मिलेगा संकेत

 


सोनीपत, 08 नवंबर (हि.स.)। सोनीपत के कुंडली स्थित राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता

एवं प्रबंधन संस्थान (निफ्टेम) ने खाद्य पदार्थों में मिलावट और गुणवत्ता की प्रारंभिक

जांच को आसान बनाने के लिए नैनो तकनीक आधारित आधुनिक जांच किट विकसित की हैं। संस्थान

की नैनो-बायोसेंसर प्रयोगशाला में वैज्ञानिक डॉ. दिनेश कुमार के मार्गदर्शन में तैयार

इन किटों से दूध, पनीर, घी और मक्खन में संभावित मिलावट के साथ खाद्य पदार्थों में

कीटनाशकों के अवशेषों की भी जांच की जा सकेगी। इन किटों की खास बात यह है कि रासायनिक

प्रतिक्रिया के बाद रंग बदल जाता है। इसके बाद दिए गए रंग चार्ट से मिलान कर मिलावट

की संभावना का शुरुआती पता लगाया जा सकता है।

निफ्टेम के निदेशक डॉ. हरिंदर सिंह ओबरॉय के अनुसार, इन किटों

को विकसित करने का उद्देश्य खाद्य पदार्थों की जांच को कम समय में आसान और कम खर्चीला

बनाना है। नैनो तकनीक, रासायनिक सेंसर और रंग आधारित तकनीक के इस्तेमाल से सीमित उपकरणों

में भी प्रारंभिक जांच की जा सकती है। हालांकि, मिलावट की अंतिम पुष्टि के लिए मान्यता

प्राप्त प्रयोगशाला में परीक्षण जरूरी होगा।

निफ्टेम की प्रयोगशाला ने टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड

के लिए पेस्टीचेक नाम की किट तैयार की है। वैज्ञानिक डॉ. दिनेश कुमार के अनुसार, इससे

खाद्य पदार्थों में 26 प्रकार के कीटनाशकों के अवशेषों की प्रारंभिक जांच की जा सकती

है। इनमें ऑर्गेनोफॉस्फोरस और कार्बामेट समूह के कीटनाशक शामिल हैं। किट में नैनोएंजाइम

आधारित रंग परिवर्तन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसकी लक्षित पहचान सीमा 10 पीपीबी

तक बताई गई है।

इसका उपयोग चायपत्ती, दूध, अनाज, फल और सब्जियों के नमूनों

की जांच में किया जा सकता है। जांच के लिए नमूने को विशेष घोल में मिलाकर उसका अर्क

तैयार किया जाता है। इसे सेंसर पट्टी पर डालकर करीब 10 मिनट तक प्रतिक्रिया होने दी

जाती है। इसके बाद दो नैनो अभिकर्मक मिलाए जाते हैं। रंग की तुलना चार्ट से की जाती

है। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार गुलाबी से नीला रंग होना नकारात्मक जांच का संकेत

है, जबकि गुलाबी रंग बने रहने पर कीटनाशक की संभावित मौजूदगी मानी जाती है। इसके परीक्षण

में 10 अलग-अलग प्रयोगशालाओं को शामिल किए जाने की जानकारी दी गई है।

पनीर में संभावित मिलावट और ताजगी का पता लगाने के लिए पनीर

चेक किट विकसित की गई है। इसमें कंघी के आकार का सेंसर लगाया गया है, जिसके पांच हिस्सों

से पांच अलग-अलग मानकों की जांच होती है। इनमें सोडा या न्यूट्रलाइजर, यूरिया, फॉर्मेल्डिहाइड,

स्टार्च और एलिजारिन आधारित ताजगी का संकेत शामिल है।

जांच के लिए पनीर के छोटे टुकड़े में सेंसर को पांच से छह

सेकंड तक लगाया जाता है। इसके बाद करीब पांच मिनट में रंग विकसित होता है। प्रत्येक

हिस्से के रंग का मिलान चार्ट से किया जाता है। संस्थान के अनुसार, इस किट का सत्यापन

राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीएल) से मान्यता प्राप्त

10 प्रयोगशालाओं में कराया गया है। इसकी भंडारण अवधि छह महीने बताई गई है। इसे भारतीय

खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की मंजूरी और रैपिड एनालिटिकल फूड टेस्टिंग

कार्यक्रम के तहत मान्यता मिलने की जानकारी भी दी गई है।

दूध में मिलावट की प्रारंभिक जांच के लिए मिल्क-ओ-स्ट्रिप

नाम की किट तैयार की गई है। इससे डिटर्जेंट, न्यूट्रलाइजर, हाइड्रोजन पेरोक्साइड, हाइपोक्लोराइट,

ग्लूकोज, माल्टोडेक्सट्रिन, फॉर्मेल्डिहाइड, नमक और यूरिया की संभावित मौजूदगी की जांच

की जा सकती है।

इसमें कंघी के आकार का सेंसर और विशेष रासायनिक अभिकर्मक इस्तेमाल

किए गए हैं। जांच के दौरान ड्रॉपर से दूध का नमूना निर्धारित जगह पर डालकर सेंसर को

पांच से छह सेकंड तक उसमें डुबोया जाता है। तय समय बाद रंग की तुलना दिए गए चार्ट से

की जाती है। इससे डेयरी और दूध संग्रह केंद्रों पर दूध की शुरुआती जांच आसान हो सकती

है। संस्थान के अनुसार, इस किट को एफएसएसएआई से स्वीकृत बताया गया है।

घी और मक्खन में पाम ऑयल, सूरजमुखी तेल और अन्य वनस्पति तेलों

की संभावित मिलावट का पता लगाने के लिए घी चेक किट विकसित की गई है। इसमें सोने के

सूक्ष्म कणों और विशेष रासायनिक अभिकर्मकों का इस्तेमाल किया गया है। रासायनिक प्रतिक्रिया

के कारण रंग में बदलाव होता है, जिससे मिलावट का शुरुआती संकेत मिलता है।

जांच के लिए घी या मक्खन के नमूने को हल्का गर्म करके तरल

किया जाता है। इसके बाद उसकी एक बूंद निर्धारित जांच सतह पर डालकर करीब एक मिनट तक

प्रतिक्रिया होने दी जाती है। फिर रंग का मिलान चार्ट से किया जाता है। घी और मक्खन

की संरचना अलग होने के कारण दोनों में इस किट की जांच क्षमता का अलग-अलग सत्यापन जरूरी

है।

संस्थान के अनुसार, इन सभी किटों का मकसद खाद्य पदार्थों में

संभावित मिलावट की समय रहते पहचान करना है। रंग बदलने से मिलने वाले संकेत उपभोक्ताओं,

डेयरी संचालकों और खाद्य कारोबारियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, किट से मिले

परिणाम प्रारंभिक जांच तक सीमित हैं। किसी पदार्थ में मिलावट की पुष्टि के लिए प्रमाणित

प्रयोगशाला में विस्तृत परीक्षण कराना जरूरी रहेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / नरेंद्र शर्मा परवाना