हिसार : 32 लाख के शोध अनुदान से गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय रचेगा नया इतिहास
देशी शैवाल से वेस्टवाटर ट्रीटमेंट की अनूठी तकनीक विकसित करेंगी डॉ. अनीता
किरडोलिया
हिसार, 28 जुलाई (हि.स.)। हरियाणा में बढ़ते जल प्रदूषण, भूजल संकट और जलवायु
परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों के समाधान की दिशा में हिसार स्थित गुरु जम्भेश्वर विज्ञान
एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय
के सिविल एवं पर्यावरण अभियांत्रिकी विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. अनीता सिंह किरडोलिया
को हरियाणा राज्य उच्च शिक्षा परिषद (एचएसएचईसी) द्वारा 32 लाख का प्रतिष्ठित अनुसंधान
अनुदान स्वीकृत किया गया है। यह अनुदान हरियाणा सरकार की ‘विकसित भारत अभियान’ के अंतर्गत स्थापित
हरियाणा राज्य अनुसंधान कोष (एचएसआरएफ) से दो वर्षीय शोध परियोजना के लिए प्रदान किया
गया है।
डॉ. अनीता सिंह किरडोलिया ‘हार्नेसिंग इंडीजैनस एल्गल स्ट्रेन्स फॉर वेस्टवाटर
रेमेडीएशन एंड क्लाइमेट-रेजिलिएंट बायोरिसोर्स डेवलपमेंट इन हरियाणा’ विषय पर शोध करेंगी।
इस परियोजना का उद्देश्य हरियाणा की देशी शैवाल (काई) प्रजातियों का उपयोग कर अपशिष्ट
जल के शोधन की ऐसी हरित तकनीक विकसित करना है, जो न केवल पर्यावरण के अनुकूल हो बल्कि
भविष्य में जल संकट के समाधान का प्रभावी मॉडल भी बन सके।
इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई
व कुलसचिव डॉ. विजय कुमार ने मंगलवार काे डॉ. अनीता सिंह किरडोलिया को बधाई देते हुए कहा कि गुजविप्रौवि
लगातार उच्चस्तरीय अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा दे रहा है। विश्वविद्यालय में आधुनिक
प्रयोगशालाएं, अत्याधुनिक उपकरण और शोध के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध है। उन्होंने
विश्वास जताया कि यह परियोजना केवल शोध तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण
और सतत विकास की दिशा में ठोस परिणाम देगी।
डॉ. अनीता सिंह किरडोलिया ने बताया कि हरियाणा में तेजी से बढ़ते शहरीकरण,
औद्योगीकरण और कृषि गतिविधियों के कारण बड़ी मात्रा में अपशिष्ट जल उत्पन्न हो रहा
है। इसमें मौजूद नाइट्रोजन, फास्फोरस, विषैले रसायन और भारी धातुएं नदियों, तालाबों
और भूजल को लगातार प्रदूषित कर रही हैं। दूसरी ओर, वर्तमान में उपयोग होने वाली पारंपरिक
जल-शोधन तकनीकें अत्यधिक महंगी, ऊर्जा-गहन और रासायनिक होने के कारण द्वितीयक प्रदूषण
भी पैदा करती हैं। इन शैवालों में प्राकृतिक रूप से
अपशिष्ट जल में मौजूद प्रदूषकों और अतिरिक्त पोषक तत्वों को अवशोषित करने की अद्भुत
क्षमता होती है। इस जैविक प्रक्रिया में किसी भी हानिकारक रसायन का उपयोग नहीं होगा,
जिससे यह तकनीक पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल होगी।
शोध परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे केवल प्रयोगशाला तक सीमित
नहीं रखा जाएगा, बल्कि पायलट स्तर पर विकसित कर वास्तविक परिस्थितियों में भी लागू
करने का प्रयास किया जाएगा। यदि यह तकनीक सफल रहती है तो नगर निकायों, उद्योगों और
ग्रामीण क्षेत्रों में अपशिष्ट जल के शोधन के लिए कम लागत वाला और टिकाऊ विकल्प उपलब्ध
हो सकेगा।
इस परियोजना से शोधित जल का पुनः उपयोग कृषि, सिंचाई और औद्योगिक कार्यों में
किया जा सकेगा, जिससे भूजल पर बढ़ता दबाव कम होगा। साथ ही, जल शोधन के दौरान प्राप्त
शैवाल बायोमास से जैविक खाद, जैव-ईंधन तथा अन्य मूल्यवान जैव-उत्पाद तैयार किए जाएंगे।
इससे न केवल अपशिष्ट का बेहतर उपयोग होगा बल्कि हरित अर्थव्यवस्था और वृत्तीय अर्थव्यवस्था
(सर्कुलर इकोनॉमी) को भी नई दिशा मिलेगी।
डॉ. किरडोलिया ने बताया कि शैवाल अपनी तीव्र प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के
माध्यम से वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को भी अवशोषित करते हैं।
ऐसे में यह तकनीक
कार्बन उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को घटाने में भी महत्वपूर्ण
भूमिका निभाएगी। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध परियोजना हरियाणा सरकार
के स्वच्छ जल एवं स्वच्छता (एसडीजी-6), सस्ती एवं स्वच्छ ऊर्जा (एसडीजी-7) तथा जलवायु
कार्रवाई (एसडीजी-13) जैसे सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में मील का पत्थर साबित
हो सकती है। यदि यह तकनीक सफल होती है तो भविष्य में हरियाणा ही नहीं, बल्कि देश के
अन्य राज्यों के लिए भी अपशिष्ट जल प्रबंधन का एक प्रभावी और टिकाऊ मॉडल उपलब्ध हो
सकेगा।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर