सोनीपत: अचूक अर्जुन गोल्डन ब्वाय कुशल की कमान का सिंहनाद जापान में गूंजा
-कुशल दलाल ने एशियन गेम्स में भारत
को स्वर्ण पदक दिलाया
-कुशल दलाल के स्वर्ण के पीछे माता-पिता
का संघर्ष और त्याग
सोनीपत, 01 अक्टूबर (हि.स.)। गोहाना
के गांव सिवानका से युवा तीरंदाज कुशल दलाल ने जापान में आयोजित आइची-नागोया एशियन
गेम्स-2026 में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतकर देश, हरियाणा और सोनीपत का नाम रोशन किया।
कंपाउंड पुरुष टीम स्पर्धा के फाइनल में कुशल दलाल, साहिल जाधव और गणेश मणि रत्नम की
भारतीय टीम ने चीन को 238-237 के अंतर से हराकर स्वर्ण पदक जीता। मुकाबले के निर्णायक
क्षण में कुशल ने सटीक निशाना लगाते हुए 10 अंक हासिल किए और भारत की जीत पक्की कर
दी।
फाइनल
मुकाबले में भारतीय टीम शुरुआती दौर में चीन से कुछ पीछे रही, लेकिन खिलाड़ियों ने
दबाव के बीच लगातार सटीक निशाने लगाए और मुकाबले में वापसी की।
अंतिम दौर में दोनों
टीमों के बीच कड़ा मुकाबला रहा। कुशल के सटीक निशाने से भारतीय टीम ने एक अंक के अंतर
से जीत दर्ज कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
कुशल
की इस उपलब्धि के पीछे उसके माता-पिता का वर्षों का त्याग और परिवार का संघर्ष भी जुड़ा
है।
कुशल के पिता संजय दलाल खेती-बाड़ी करते हैं, जबकि उसकी मां गीता हरियाणा राज्य
कृषि विभाग से जुड़े कृषि विपणन क्षेत्र में लेखाकार के पद पर खरखौदा में सेवारत हैं।
बेटे को तीरंदाजी में आगे बढ़ाने के लिए परिवार ने उसकी जरूरतों को प्राथमिकता दी।
महंगे खेल उपकरणों के बावजूद पिता ने करीब 3.50 लाख रुपये का धनुष और तीर खरीदकर बेटे
के अभ्यास में कोई कमी नहीं आने दी।
वर्ष
2017 में कुशल ने अपनी मां के साथ रोहतक के सेक्टर-1 में रहकर राजीव गांधी स्टेडियम
में तीरंदाजी का नियमित अभ्यास शुरू किया। रोजाना शाम तीन से छह बजे तक वह तीरंदाजी
का अभ्यास करता था।
इसके बाद शाम छह से साढ़े सात बजे तक शारीरिक प्रशिक्षण लेता था।
बेटे की नियमित प्रैक्टिस के दौरान मां गीता भी उसके साथ मैदान में रहती थीं। उस समय
वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थीं और बेटे के अभ्यास के दौरान मैदान में
बैठकर अपनी पढ़ाई करती थीं। इस तरह बेटा खेल की तैयारी करता रहा और मां भी अपनी मंजिल
के लिए मेहनत करती रहीं।
गीता
के अनुसार, बेटे के खेल में किसी तरह की बाधा न आए, इसके लिए परिवार ने कई बार सामाजिक
और पारिवारिक कार्यक्रमों से दूरी बनाई। कुशल के अभ्यास और प्रतियोगिताओं को प्राथमिकता
दी गई। लगातार मेहनत के बाद गीता ने सरकारी नौकरी हासिल की और आज वह लेखाकार के पद
पर कार्यरत हैं। बेटे की सफलता में मां की मौजूदगी और प्रोत्साहन लगातार बना रहा।
कुशल
ने वर्ष 2018 में आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में अंडर-14 वर्ग में अपना पहला स्वर्ण
पदक जीता। इसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसका चयन खेलो इंडिया के लिए हुआ और
हरियाणा की खेल नीति का भी लाभ मिला। राष्ट्रीय स्कूल खेलों सहित विभिन्न प्रतियोगिताओं
में उसने लगातार पदक हासिल किए।
वर्ष
2021 में पोलैंड में आयोजित यूथ वर्ल्ड चैंपियनशिप में कुशल ने दो स्वर्ण पदक जीते।
वह अब तक सब-जूनियर, जूनियर और सीनियर वर्गों में 15 से अधिक पदक जीत चुका है। हर प्रतियोगिता
के साथ उसका लक्ष्य बड़ा होता गया। एशियन गेम्स में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर उसने
अपनी मेहनत के साथ माता-पिता के त्याग को भी सार्थक किया है।
कुशल
की इस उपलब्धि पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने उसे बधाई दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि
हरियाणा के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर लगातार बेहतर प्रदर्शन कर प्रदेश और देश
का गौरव बढ़ा रहे हैं।
कुशल
की सफलता में परिवार के साथ प्रशिक्षकों और खेल व्यवस्था का भी योगदान रहा। नियमित
अभ्यास, शारीरिक प्रशिक्षण, महंगे खेल उपकरण, प्रतियोगिताओं की तैयारी और परिवार के
निरंतर सहयोग ने उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
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हिन्दुस्थान समाचार / नरेंद्र शर्मा परवाना