हिसार के वैज्ञानिकों ने विकसित की देश की पहली ‘थीलीरिया क्लिनिकल निर्णय सहयोग प्रणाली’
नई खाेज काे भारत सरकार से मिला
कॉपीराइट
हिसार, 06 जुलाई (हि.स.)। लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय
(लुवास), के वैज्ञानिकों ने पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल
करते हुए ‘थीलीरिया क्लिनिकल निर्णय सहयोग प्रणाली’ विकसित की है। इस अभिनव डिजिटल प्रणाली को भारत
सरकार के कॉपीराइट कार्यालय द्वारा 11 जून को आधिकारिक कॉपीराइट प्रदान किया गया है।
यह स्वदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म पशुओं में होने वाले थीलीरिया रोग के त्वरित, सटीक एवं
साक्ष्य-आधारित निदान तथा उपचार संबंधी निर्णय लेने में पशु चिकित्सकों की प्रभावी
सहायता करेगा।
यह प्रणाली डॉ. रेमन मोर द्वारा अपने एमवीएससी शोध कार्य के दौरान डॉ. अंकित
कुमार के मार्गदर्शन में विकसित की गई। यह प्रणाली रोग की पहचान, गंभीरता का आकलन,
उपचार योजना, रक्ताधान (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) की आवश्यकता तथा वैज्ञानिक उपचार संबंधी
निर्णय लेने में सहायता प्रदान करती है।
इस प्रणाली की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह पूर्णतः ऑफलाइन कार्य करती है,
जिससे इंटरनेट सुविधा न होने वाले ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में भी इसका प्रभावी
उपयोग संभव है। यह प्लेटफॉर्म पशु चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों एवं पशुपालकों
के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगा तथा डिजिटल पशु स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा
देगा।
इस उपलब्धि के उपलक्ष्य में वैज्ञानिकों ने साेमवार काे कुलपति प्रो. (डॉ.) विनोद कुमार
वर्मा से शिष्टाचार भेंट की। कुलपति ने शोध टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह नवाचार
विश्वविद्यालय की अनुसंधान संस्कृति, वैज्ञानिक सोच एवं नवाचार के प्रति प्रतिबद्धता
का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह प्रणाली भविष्य में पशु
चिकित्सकों के लिए एक प्रभावी निर्णय सहयोग उपकरण सिद्ध होगी तथा पशुपालकों को समयबद्ध
एवं गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
पशु चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. राजेश खुराना ने भी शोधकर्ताओं
को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की मेहनत, समर्पण
एवं उत्कृष्ट अनुसंधान का परिणाम है। उन्होंने कहा कि ऐसे नवाचार न केवल पशु चिकित्सा
शिक्षा एवं अनुसंधान को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगे, बल्कि देश में डिजिटल पशु स्वास्थ्य
सेवाओं को भी सशक्त बनाएंगे।
इस तकनीक के विकास में डॉ. रेमन मोर, डॉ. अंकित कुमार, डॉ. तरुण कुमार, डॉ.
नीलेश सिंधु, डॉ. मनीष शर्मा, डॉ. सुखदीप वोहरा, डॉ. बिस्वा रंजन महाराणा तथा डॉ. अंकित
मगोत्रा का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
विशेषज्ञों के अनुसार, ‘थीलीरिया क्लिनिकल निर्णय सहयोग प्रणाली’ भारत में विकसित एक
स्वदेशी डिजिटल समाधान है, जो डिजिटल इंडिया एवं मेक इन इंडिया की परिकल्पना को साकार
करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रणाली फील्ड स्तर पर प्राप्त जानकारी
को वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से साक्ष्य-आधारित चिकित्सकीय निर्णयों में परिवर्तित
करती है, जिससे रोग का शीघ्र निदान, बेहतर उपचार एवं पशुधन स्वास्थ्य प्रबंधन को नई
मजबूती मिलेगी।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय की अनुसंधान निदेशक डॉ. सुशीला मान, मानव संसाधन
एवं प्रबंधन निदेशक डॉ. सोनिया सिंधु तथा स्नातकोत्तर अधिष्ठाता डॉ. सुखदीप वोहरा भी
उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर