हरियाणा का भूजल: कहीं ‘उत्तम’, कहीं बढ़ती लवणीयता की चुनौती

 


हरियाणा में लगभग 31.83 प्रतिशत भूजल ‘उत्तम

गुणवत्ता जल’ श्रेणी में पाया गया

कुलपति प्रो. कम्बोज ने किया हरियाणा राज्य के

जल गुणवत्ता मानचित्र का विमोचन

हिसार, 26 मई (हि.स.)। हरियाणा में खेती की दिशा

और भविष्य तय करने में अब भूजल की गुणवत्ता अहम भूमिका निभाने जा रही है। किसानों को

यह जानने में आसानी होगी कि उनके क्षेत्र का पानी किस फसल के लिए उपयुक्त है और किस

प्रकार के सिंचाई प्रबंधन की जरूरत है। इसी उद्देश्य से यहां के हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय

के वैज्ञानिकों ने राज्य का विस्तृत जल गुणवत्ता मानचित्र तैयार किया है, जिसका विमोचन

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बलदेव राज कम्बोज ने मंगलवार काे किया।

विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग द्वारा

तैयार किए गए इस मानचित्र में हरियाणा के विभिन्न जिलों के भूजल का वैज्ञानिक विश्लेषण

कर उसकी गुणवत्ता का वर्गीकरण किया गया है। अध्ययन में सामने आया कि राज्य का लगभग

31.83 प्रतिशत भूजल ‘उत्तम गुणवत्ता जल’ श्रेणी में है, जिसका उपयोग अधिकांश फसलों की सफल सिंचाई

के लिए किया जा सकता है। वहीं करीब 30.04 प्रतिशत जल ‘सीमांत लवणीय जल’ श्रेणी में पाया गया

है, जो सामान्य फसलों के बजाय लवण-सहनशील फसलों के लिए अधिक उपयुक्त माना गया है।

कुलपति प्रो. कम्बोज ने कहा कि बदलते जल संकट

और मिट्टी की बिगड़ती गुणवत्ता के बीच खराब गुणवत्ता वाले सिंचाई जल का वैज्ञानिक एवं

संतुलित प्रबंधन समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। उनका कहना था कि यह मानचित्र किसानों

को यह समझने में मदद करेगा कि किस क्षेत्र में कौन-सी फसल बेहतर उत्पादन दे सकती है।

इससे न केवल कृषि उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और टिकाऊ

कृषि प्रणाली को भी मजबूती मिलेगी। उन्होंने बताया कि यह कार्य भारतीय कृषि अनुसंधान

परिषद की अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना ‘लवणीय जल का प्रबंधन एवं कृषि में

संबंधित लवणीकरण’ के अंतर्गत किया गया है। परियोजना के तहत राज्यभर से भूजल के नमूने एकत्रित

कर उनकी वैज्ञानिक जांच की गई और उसके आधार पर जल गुणवत्ता का मानचित्रण तैयार किया

गया।

अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग ने कहा कि भविष्य

की कृषि को सुरक्षित और टिकाऊ बनाने के लिए जल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन बेहद

जरूरी है। यदि किसान जल गुणवत्ता के अनुसार फसल और सिंचाई पद्धति अपनाएं तो इससे उनकी

लागत घटेगी और आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

मृदा विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. दिनेश तोमर ने

बताया कि अध्ययन के अनुसार राज्य में 6.04 प्रतिशत जल खारा, 19.50 प्रतिशत उच्च एसएआर

खारा जल, 5.67 प्रतिशत थोड़ा सोडियम युक्त, 1.66 प्रतिशत सोडियम युक्त तथा 5.26 प्रतिशत

उच्च सोडियम युक्त श्रेणी में पाया गया है। उन्होंने बताया कि इस परियोजना में सीएसएसआरआई

के विभिन्न परियोजना समन्वयकों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इस अवसर पर परियोजना प्रभारी डॉ. रामप्रकाश सहित

डॉ. संजय कुमार, डॉ. राजपाल यादव, डॉ. सरिता रानी, डॉ. अंकुश ढांडा, डॉ. सज्जन कुमार

शर्मा और डॉ. सत्यवान भी उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर