हिसार : गुरु जम्भेश्वर विवि. में उच्च तापमान पर कार्य करने वाले थर्मोइलेक्ट्रिक चैल्कोजेनाइड पर होगा शोध

 


हरियाणा राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद ने भौतिकी विभाग के डॉ. हरदेव सैनी को स्वीकृत

किया 18 लाख का शोध प्रोजेक्ट

स्वच्छ ऊर्जा व औद्योगिक ऊर्जा दक्षता की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा

अनुसंधान : कुलपति

हिसार, 21 जुलाई (हि.स.)। गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय

के भौतिकी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. हरदेव सैनी को हरियाणा राज्य उच्चतर शिक्षा

परिषद (एचएसएचईसी) द्वारा 18 लाख रुपये का दो वर्षीय शोध प्रोजेक्ट स्वीकृत किया गया

है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत उच्च तापमान पर कार्य करने वाले उन्नत थर्मोइलेक्ट्रिक

चैल्कोजेनाइड पदार्थों की पहचान, संश्लेषण, फैब्रिकेशन एवं उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन

किया जाएगा। यह शोध ऊर्जा संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन तथा औद्योगिक क्षेत्रों में

ऊर्जा दक्षता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने मंगलवार काे इस उपलब्धि पर डॉ. हरदेव

सैनी और उनकी टीम को हार्दिक बधाई देते हुए कहा कि गुजविप्रौवि में उच्चस्तरीय शोध

के लिए आधुनिक प्रयोगशालाएं, उन्नत उपकरण और अनुकूल शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध है। उन्होंने

कहा कि विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं शोधार्थी निरंतर गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान कर रहे

हैं, जिसके परिणामस्वरूप संस्थान को लगातार राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय शोध परियोजनाएं

प्राप्त हो रही हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह परियोजना विश्वविद्यालय की

शोध उपलब्धियों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी और गुजविप्रौवि की राष्ट्रीय पहचान को

और अधिक मजबूत करेगी।

इस परियोजना में डॉ. हरदेव सैनी प्रधान अन्वेषक (प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर)

तथा डॉ. विवेक गुप्ता सह-प्रधान अन्वेषक के रूप में कार्य करेंगे। इस शोध परियोजना

का शीर्षक ‘डेटा-ड्रिवन इंटीग्रेटेड डीपफेट स्क्रीनिंग एंड फैब्रिकेशन ऑफ रोबस्ट चैल्कोजेनाइड्स

फॉर हाई टेम्परेचर थर्मोइलेक्ट्रिक एप्लीकेशंस’ है।

डॉ. हरदेव सैनी ने बताया कि यह परियोजना अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से ऐसे

पदार्थों की खोज और विकास पर केंद्रित है, जो उद्योगों से निकलने वाली अपशिष्ट ऊष्मा

(वेस्ट हीट) को उपयोगी विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित कर सकें। इस परियोजना में डीपफेट,

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तथा मशीन लर्निंग (एमएल) जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग

किया जाएगा। इन तकनीकों की सहायता से विकसित की जाने वाली सामग्री औद्योगिक अपशिष्ट

ऊष्मा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने वाली ऊर्जा-कुशल तकनीकों के विकास में सहायक

होगी। इससे न केवल ऊर्जा की बचत होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लक्ष्यों

को भी बल मिलेगा।उन्होंने बताया कि यह परियोजना कम्प्यूटेशनल एवं प्रायोगिक अनुसंधान

के समन्वय पर आधारित है।

इसके माध्यम से शोधार्थियों को एआई आधारित मटेरियल डिजाइन,

उन्नत डेटा विश्लेषण, आधुनिक प्रयोगात्मक तकनीकों तथा अत्याधुनिक अनुसंधान पद्धतियों

का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी मिलेगा। इससे विश्वविद्यालय में शोध संस्कृति को बढ़ावा

मिलेगा और युवा वैज्ञानिकों को वैश्विक स्तर की अनुसंधान तकनीकों से जुड़ने का अवसर

प्राप्त होगा। विशेषज्ञों के अनुसार थर्मोइलेक्ट्रिक चैल्कोजेनाइड पदार्थों पर आधारित यह

शोध भविष्य में ऊर्जा संकट से निपटने, औद्योगिक ऊर्जा हानि को कम करने तथा वैकल्पिक

ऊर्जा स्रोतों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर