ब्रज की परंपरा से जुड़ा पलवल, यहां होली का उत्सव होता है विशेष

 


पलवल, 04 मार्च (हि.स.)। ब्रज क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण पलवल जिले में होली का पर्व विशेष उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े ब्रज क्षेत्र में होली का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व सदियों से रहा है। इसी परंपरा की झलक पलवल जिले में भी देखने को मिलती है, जहां होली केवल रंगों का त्योहार ही नहीं बल्कि आस्था, भक्ति और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक बनकर सामने आती है।

आचार्य वासुदेव श्री कृष्ण जी महाराज ने बुधवार काे बताया कि पलवल में होली का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि पलवल ब्रज की प्रसिद्ध 84 कोस परिक्रमा में शामिल है। ब्रज क्षेत्र की इस परिक्रमा का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है और इसके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में होली का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि ब्रज क्षेत्र में होली केवल एक दिन का पर्व नहीं होता, बल्कि फाल्गुन मास लगते ही होली के उत्सव की शुरुआत हो जाती है। मंदिरों, चौपालों और गांवों में फाग और होली के पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। ढोलक, मंजीरा और झांझ की धुन पर श्रद्धालु और ग्रामीण मिलकर ब्रज के फाग गाते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

पलवल और आसपास के क्षेत्रों में होली के दिन लोग सुबह से ही एक-दूसरे के घर जाकर गुलाल लगाते हैं और होली की शुभकामनाएं देते हैं। बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है और छोटे-बड़े सभी मिलकर इस पर्व को प्रेम और भाईचारे के साथ मनाते हैं। कई स्थानों पर होली मिलन समारोह भी आयोजित किए जाते हैं, जहां लोग पारंपरिक गीत-संगीत के साथ होली का आनंद लेते हैं।

ब्रज संस्कृति से प्रभावित होने के कारण पलवल में होली का उत्सव रंगों के साथ-साथ भक्ति और परंपरा का भी प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि हर वर्ष यहां होली का पर्व विशेष उल्लास और सांस्कृतिक रंगों के साथ मनाया जाता है, जो ब्रज की समृद्ध परंपरा और धार्मिक महत्व को दर्शाता है।

हिन्दुस्थान समाचार / गुरुदत्त गर्ग