सोनीपत के नितेश ने एशियाई ग्रीको-रोमन कुश्ती खेलों में रजत जीतकर इतिहास रचा
सोनीपत, 02 अक्टूबर (हि.स.)। जापान
के यूरी नकाजातो से ग्रीको-रोमन कुश्ती के फाइनल में हार के बावजूद सोनीपत के जागसी
गांव के नितेश सिवाच ने एशियाई खेलों में रजत पदक जीतकर भारतीय कुश्ती में नया इतिहास
रचा। नितेश का रजत पदक लंबे अंतराल के बाद ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत के पदक का सूखा
खत्म करने वाला रहा। इससे पहले 1962 के एशियाई खेलों में गणपत अंदलकर ने 97 किलोग्राम
से अधिक भारवर्ग में भारत के लिए पदक जीता था। इसके बाद भारतीय ग्रीको-रोमन पहलवान
इस प्रतियोगिता में पदक नहीं जीत सके थे।
फाइनल
में नितेश के पास जापानी पहलवान को हराकर स्वर्ण जीतने का मौका था, लेकिन उन्हें रजत
से संतोष करना पड़ा। इससे पहले भारत के सुमित 60 किलोग्राम और अमन बरोनिया 77 किलोग्राम
भारवर्ग में क्वार्टर फाइनल में हारकर बाहर हो गए थे। नितेश
के पिता आनंद ने बताया कि नितेश उनका इकलौता बेटा है। बचपन से ही उनका सपना था कि बेटा
पहलवान बने। वह खुद भी पहलवानी करना चाहते थे, लेकिन मौका नहीं मिला। वर्ष 2008 में
करीब छह साल की उम्र में नितेश को गांव के अखाड़े में अभ्यास के लिए ले जाना शुरू किया।
करीब चार साल तक वह रोज सुबह-शाम उसे अखाड़े में ले जाते और अभ्यास के बाद घर लाते
रहे।
वर्ष
2012 में खरखौदा के निजी स्कूल में पढ़ाई के साथ नितेश ने कुश्ती जारी रखी। वर्ष
2014 में प्रताप स्पोर्ट्स स्कूल में अभ्यास के दौरान उसके घुटने में गंभीर चोट लग
गई। ऑपरेशन के बाद करीब एक साल तक वह बिस्तर पर रहा। इस दौरान वह मानसिक रूप से भी
परेशान रहने लगा। पिता ने उसे दूध के कारोबार में हाथ बंटाने को कहा। करीब एक साल तक
नितेश गांव से दूध खरीदकर पानीपत में दुकान और घर-घर जाकर बेचता रहा। इसके बाद उसने
दोबारा कुश्ती खेलने की इच्छा जताई। पिता की अनुमति मिलने पर वर्ष 2017 में खरखौदा
की निजी कुश्ती अकादमी में अभ्यास शुरू किया। आनंद के अनुसार
नितेश की पहलवानी पर करीब 15 हजार रुपये महीने खर्च होते थे। करीब 12 साल पहले
परिवार जागसी से पानीपत के सेक्टर-6 में आकर रहने लगा और दूध का कारोबार शुरू किया।
नितेश
ने कुश्ती के साथ पढ़ाई भी जारी रखी। वर्ष 2025 में स्नातक के अंतिम वर्ष में उसे कंपार्टमेंट
आई। दोबारा परीक्षा देने के बाद 2026 में भी वह इसे पास नहीं कर सका। हालांकि, कुश्ती
में उसने लगातार मेहनत जारी रखी। वर्ष 2022 में उसे रेलवे में टिकट निरीक्षक के पद
पर नौकरी मिली। आनंद
ने बताया कि संयुक्त परिवार में रहने के कारण नितेश को लगातार परिवार का सहयोग मिला।
उसके चाचा नवीन के दोनों बेटे भी खरखौदा की कुश्ती अकादमी में अभ्यास करते हैं। परिवार
के इसी कुश्ती माहौल और नितेश की मेहनत का नतीजा अब एशियाई खेलों के रजत पदक के रूप
में सामने आया है।
हिन्दुस्थान समाचार / नरेंद्र शर्मा परवाना