नूंह: केवट ने श्रीराम को कराया गंगा पार, भरत के त्याग व समर्पण ने दर्शकों को किया भावविभोर
नूंह, 16 अक्टूबर (हि.स.)। जिन श्रीराम के चरणों की रज प्राप्त करने के लिए देवगण भी लालायित रहते हैं, उन्हीं प्रभु श्रीराम के चरणों को धोकर केवट ने अपना जीवन धन्य कर लिया। केवट और श्रीराम के इस भक्तिपूर्ण प्रसंग के साथ भरत-मिलाप, शूर्पणखा की नाक काटने तथा खर-दूषण वध के दृश्यों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। कस्बा नगीना के गोहरवाली चौक स्थित प्रांगण में श्री रामलीला विकास कमेटी (रजिस्टर्ड) के तत्वावधान में आयोजित रामलीला में कलाकारों ने अपनी सशक्त अभिनय कला से धार्मिक, सांस्कृतिक और मार्मिक प्रसंगों को जीवंत कर दिया।
रामलीला के मंचन में भक्ति, त्याग, तपस्या, मर्यादा और भाईचारे का संदेश देने वाले विभिन्न प्रसंग प्रस्तुत किए गए। केवट प्रसंग में प्रभु श्रीराम को गंगा पार कराने से पहले उनके चरण धोने का दृश्य विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। इस प्रसंग ने दर्शकों को भगवान के प्रति निष्कपट प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का संदेश दिया। भरत के ननिहाल से अयोध्या लौटने और वनवास का पूरा घटनाक्रम जानने के बाद व्याकुल होने का दृश्य भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया। माता कैकेयी के निर्णय से दुखी भरत ने अयोध्या का राजपाट स्वीकार करने से इनकार कर दिया और गुरु वशिष्ठ, माता कौशल्या, माता कैकेयी, माता सुमित्रा, भाई शत्रुघ्न तथा नगरवासियों के साथ प्रभु श्रीराम से मिलने चित्रकूट के लिए प्रस्थान किया।
अयोध्या की सेना और भरत को अपनी ओर आते देख लक्ष्मण क्रोधित हो उठते हैं, लेकिन श्रीराम उन्हें समझाकर शांत करते हैं। चित्रकूट पहुंचकर भरत अपने बड़े भाई श्रीराम के चरणों में गिर पड़ते हैं और उन्हें अयोध्या लौटने की विनती करते हैं। दोनों भाइयों के गले मिलने और भावुक संवादों के दृश्य ने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। भरत ने श्रीराम से अयोध्या लौटकर राजपाट संभालने का आग्रह किया, लेकिन पिता राजा दशरथ के वचन का पालन करते हुए श्रीराम ने 14 वर्ष का वनवास पूरा करने का अपना संकल्प दोहराया। श्रीराम ने अपनी चरण पादुकाएं भरत को सौंप दीं। भरत ने उन पादुकाओं को आदरपूर्वक अपने शीश पर धारण किया और अयोध्या लौट गए। इस प्रसंग के माध्यम से कलाकारों ने त्याग, मर्यादा, भाईचारे और कर्तव्यनिष्ठा का प्रेरणादायक संदेश दिया। रामलीला में शूर्पणखा की लीला व नाक कटने की लीला राेमांचक रही।
हिन्दुस्थान समाचार / अनिल मोहानिया