हिसार : धान उत्पादक जिलों में पराली प्रबंधन अभियान तेज, 6000 किसानों तक पहुंचेगा एचएयू

 


89 जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए

किसानों को पराली न जलाने के लिए किया जाएगा प्रेरित

हिसार, 19 सितंबर (हि.स.)। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय

ने कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), जोधपुर के सहयोग से प्रदेश

के प्रमुख धान उत्पादक जिलों में पराली प्रबंधन अभियान तेज कर दिया है। कृषि विज्ञान

केंद्रों के माध्यम से चलाए जा रहे इस अभियान का उद्देश्य धान की पराली जलाने की समस्या

पर रोक लगाने के साथ किसानों को इन-सीटू और एक्स-सीटू फसल अवशेष प्रबंधन की व्यावहारिक,

किफायती और स्थानीय तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है।

कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज ने शनिवार काे कहा कि फसल अवशेषों

का वैज्ञानिक प्रबंधन वायु प्रदूषण रोकने के साथ मृदा स्वास्थ्य, नमी संरक्षण और ग्रीनहाउस

गैसों के उत्सर्जन में कमी के लिए भी महत्वपूर्ण है। इससे गेहूं की समय पर बिजाई में

भी मदद मिलती है। उन्होंने किसानों से पराली को कचरा नहीं, बल्कि कृषि संसाधन मानते

हुए वैज्ञानिक प्रबंधन तकनीक अपनाने तथा फसल अवशेष न जलाने को सामूहिक संकल्प बनाने

की अपील की।

सितंबर में विश्वविद्यालय ने करीब 6000 किसानों

तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। इसके तहत 46 ग्राम स्तरीय, 14 खंड स्तरीय, 12 जिला स्तरीय

जागरूकता कार्यक्रम और 17 विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें किसानों

को खेत स्तर पर प्रदर्शन और व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से पराली प्रबंधन की उपयुक्त

तकनीकों की जानकारी दी जाएगी। अभियान आगामी महीनों में भी जारी रहेगा और गेहूं की बिजाई

शुरू होने तक किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन दिया जाएगा।

कुलपति ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र कृषि

एवं किसान कल्याण विभाग, जिला प्रशासन, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और

कस्टम हायरिंग सेंटरों सहित अन्य संस्थाओं के साथ समन्वय कर रहे हैं, ताकि किसानों

को आवश्यक मशीनरी, संसाधन और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध हो सकें। किसानों को पराली को

खेत में ही प्रबंधित करने के साथ पशु चारे, जैव ऊर्जा और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों

में उपयोग के विकल्प भी बताए जा रहे हैं।

विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. नरेश कौशिक ने बताया

कि किसानों को सरकारी योजनाओं के तहत उपलब्ध वित्तीय सहायता और अन्य सहयोग की जानकारी

भी दी जा रही है। उन्होंने कहा कि फसल अवशेष कचरा नहीं, बल्कि एक मूल्यवान संसाधन है।

केवीके नेटवर्क का उद्देश्य फसल अवशेष प्रबंधन को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संसाधन बचत,

गेहूं की समय पर बिजाई, ग्रामीण उद्यमिता और जलवायु-सक्षम कृषि से जोड़ना है।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर