हिसार : नहरों में दो सप्ताह पानी छोड़ने की मांग पर किसानों का लघु सचिवालय में डेरा

 


24 घंटे के पड़ाव से सरकार को दी चेतावनी, टेल

तक नहीं पहुंच रहा पानी

हिसार, 27 जुलाई (हि.स.)। नहरों में पर्याप्त

अवधि तक पानी छोड़ने, टेल तक सिंचाई का पानी पहुंचाने और पेयजल संकट के स्थायी समाधान

की मांग पर सोमवार को किसानों का गुस्सा सड़कों पर उतर आया। पगड़ी संभाल जट्टा संघर्ष

समिति और जल संघर्ष समिति के बैनर तले बड़ी संख्या में किसान जिले के लघु सचिवालय पहुंचे

और वहीं 24 घंटे का पड़ाव शुरू कर दिया। किसानों ने सरकार और सिंचाई विभाग पर किसानों

की समस्याओं की लगातार अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी कि यदि जल्द समाधान

नहीं हुआ तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।

धरने का नेतृत्व कर रहे किसान नेता सतीश बेनीवाल

ने कहा कि जिले के बालसमंद, सिवानी और टेल क्षेत्र के अनेक गांव गंभीर सिंचाई और पेयजल

संकट से जूझ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नहरों की समय पर सफाई नहीं होने और वर्षों

से मरम्मत नहीं होने के कारण पानी छोड़ते ही कई स्थानों पर नहरें टूट जाती हैं। इसका

खामियाजा सीधे किसानों को भुगतना पड़ता है, जबकि संबंधित विभाग मूकदर्शक बना रहता है।

उन्होंने कहा कि घग्गर ड्रेन हर वर्ष किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाती है, लेकिन

सरकार अब तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं कर पाई है। दूसरी ओर किसानों को समय पर खाद

भी उपलब्ध नहीं हो रही, जिससे खेती का पूरा चक्र प्रभावित हो रहा है।

किसान नेता ने विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली

पर सवाल उठाते हुए कहा कि अधिकारी केवल कार्यालयों तक सीमित हैं, जबकि उन्हें नहरों

के अंतिम छोर तक जाकर वास्तविक स्थिति देखनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि बीच रास्ते

में अवैध रूप से पानी का बंटवारा होने के कारण टेल तक पानी पहुंच ही नहीं रहा, जिससे

अंतिम गांवों के किसान सबसे अधिक प्रभावित हैं। किसानों ने कहा कि उनकी प्रमुख मांग है कि हिसार

की नहरों में लगातार दो सप्ताह तक पानी छोड़ा जाए, ताकि खरीफ सीजन में फसलों को पर्याप्त

सिंचाई मिल सके और पेयजल संकट भी दूर हो। साथ ही नहरों की सफाई, मरम्मत, टेल तक पानी

की सुनिश्चित आपूर्ति, घग्गर ड्रेन की समस्या का स्थायी समाधान और किसानों को समय पर

खाद उपलब्ध कराई जाए। धरने पर मौजूद किसानों ने स्पष्ट शब्दों में कहा

कि यह लड़ाई केवल पानी की नहीं, बल्कि किसानों के अस्तित्व और खेती बचाने की है। जब

तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर