हिसार : राखीगढ़ी के डीएनए से खुलेगा प्राचीन सभ्यता का राज

 


-20 कंकालों की जांच से प्राचीन लोगों के खानपान, रहन-सहन और मृत्यु के कारणों

से जुड़े रहस्यों से उठ सकता है पर्दा

-साढ़े चार हजार साल पुराने कंकाल के डीएनए पर शोध जारी

हिसार, 24 अक्टूबर (हि.स.)। राखीगढ़ी की प्राचीन सभ्यता के रहस्यों को समझने

के लिए वैज्ञानिकों का शोध लगातार जारी है। यहां मिले मानव कंकालों के डीएनए के अध्ययन

से हजारों वर्ष पुराने लोगों के जीवन, खानपान, कृषि और उनके पूर्वजों से जुड़े महत्वपूर्ण

तथ्य सामने आने की उम्मीद है। बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट, लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.

नीरज राय के अनुसार, दक्षिण एशिया में करीब 12 हजार साल पहले शिकार करने और प्रकृति

से भोजन जुटाकर जीवनयापन करने वाले लोग अलग-अलग समूहों में रहते थे।

शोध के अनुसार, इन समूहों के पूर्वजों के बीच समय के साथ अलगाव हुआ और अलग-अलग

क्षेत्रों में उनकी जीवनशैली तथा सभ्यताओं का विकास हुआ। राखीगढ़ी में मिले करीब साढ़े

चार हजार साल पुराने मानव कंकाल का डीएनए इस प्राचीन आबादी को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण

माना जा रहा है। राखीगढ़ी सरस्वती-सिंधु सभ्यता का प्रमुख पुरातात्विक स्थल है। यहां से प्राप्त

पुरातात्विक साक्ष्य उस समय के कृषि कार्यों, पशुपालन, भोजन और नगर जीवन के बारे में

जानकारी देते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस सभ्यता के विकास से पहले मानव समुदायों

का जीवन काफी हद तक शिकार और प्राकृतिक संसाधनों से भोजन जुटाने पर निर्भर था। समय

के साथ विभिन्न क्षेत्रों में कृषि और पशुपालन का विकास हुआ तथा स्थायी बस्तियां बसने

लगीं। राखीगढ़ी में मिले मानव अवशेषों के डीएनए का अध्ययन इस बदलाव और उस समय के लोगों

की आनुवंशिक संरचना को समझने में मदद कर सकता है।

डीएनए के अध्ययन से पूर्वजों के संबंधों का लगाया जा रहा पता

डॉ. नीरज राय ने बताया कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त डीएनए नमूनों

के साथ राखीगढ़ी से मिले डीएनए का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। उनके अनुसार, राखीगढ़ी

के प्राचीन लोगों और ईरान के प्राचीन कृषक समुदायों के बीच आनुवंशिक संबंधों के संकेत

मिले हैं। शोध में करीब 12 हजार साल पहले इनसे संबंधित पूर्वज आबादियों के अलग होने

की संभावना पर भी अध्ययन किया गया है। उन्होंने बताया कि देशभर के करीब 10 हजार लोगों

के डीएनए नमूनों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन के आधार पर वर्तमान

भारतीय आबादी और प्राचीन सरस्वती-सिंधु सभ्यता के लोगों के बीच आनुवंशिक संबंधों को

समझने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, इन संबंधों की व्याख्या के लिए अलग-अलग वैज्ञानिक

साक्ष्यों और शोध निष्कर्षों का अध्ययन जरूरी है।

20 कंकालों पर चल रहा शोध, रिपोर्ट से मिल सकती है नई जानकारी

पिछले वर्ष हुई खुदाई के दौरान मिले करीब 20 मानव कंकालों पर शोध जारी है।

डॉ. नीरज राय के अनुसार, इन कंकालों से प्राप्त नमूनों की जांच कर अलग-अलग रिपोर्ट

तैयार की जा रही हैं। इन अध्ययनों के जरिए प्राचीन लोगों की आनुवंशिक संरचना, खानपान,

शारीरिक विशेषताओं और संभावित मृत्यु कारणों के बारे में जानकारी जुटाने का प्रयास

किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि डीएनए संबंधी जांच देश की प्रयोगशालाओं में की जा

रही है। शोध पूरा होने के बाद इन कंकालों से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब मिलने

की उम्मीद है। राखीगढ़ी से प्राप्त ये साक्ष्य न केवल सरस्वती-सिंधु सभ्यता के इतिहास

को समझने में मदद कर सकते हैं, बल्कि प्राचीन मानव आबादी के विकास और विभिन्न समुदायों

के आपसी संबंधों पर भी नई रोशनी डाल सकते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर