1122 करोड़ की योजना से हरियाणा में बदलेगा खेती का ढांचा
-मशीनों से लेकर प्राकृतिक खेती तक के विस्तर का ब्लूप्रिंट तैयार
चंडीगढ़, 19 मार्च (हि.स.)। हरियाणा की खेती को परंपरागत ढांचे से निकालकर आधुनिक, टिकाऊ और मुनाफे वाली दिशा में ले जाने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (पीएम-आरकेवीवाई) के तहत राज्य के लिए 1122 करोड़ रुपये की व्यापक कार्ययोजना को मंजूरी दी गई है। यह फैसला मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई राज्य स्तरीय स्वीकृति समिति (एसएलएससी) की बैठक में लिया गया।
इस योजना को केवल बजट आवंटन तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसे खेती के संपूर्ण बदलाव के रूप में तैयार किया गया है, जहां तकनीक, पानी की बचत, फसल विविधीकरण और प्राकृतिक खेती को एक साथ जोड़ा गया है। राज्य सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि अब खेती को श्रम आधारित नहीं बल्कि तकनीक आधारित बनाया जाएगा।
कृषि मशीनीकरण के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके तहत किसानों को आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए जाएंगे, जिससे लागत घटेगी और उत्पादन क्षमता बढ़ेगी। खास बात यह है कि छोटे और मध्यम किसानों को भी इन मशीनों तक पहुंच सुनिश्चित करने की रणनीति बनाई गई है, ताकि तकनीक का लाभ केवल बड़े किसानों तक सीमित न रहे।
बैठक में यह भी सामने आया कि वर्ष 2025-26 में मिली 318.17 करोड़ रुपये की राशि में से 75 प्रतिशत से अधिक खर्च किया जा चुका है। यह संकेत है कि योजनाओं का क्रियान्वयन पहले के मुकाबले बेहतर हुआ है। मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि योजनाओं का लाभ जमीन पर दिखना चाहिए। समयबद्ध तरीके से फंड का उपयोग और विभागों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
पराली प्रबंधन को 250 करोड़ की योजना
हर साल सर्दियों में हरियाणा की पहचान बन चुकी पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए इस बार सरकार ने सख्ती के बजाय समाधान का रास्ता चुना है। फसल अवशेष प्रबंधन के लिए 250 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। इस बजट का इस्तेमाल मशीनों की खरीद, सब्सिडी और जागरूकता अभियानों पर किया जाएगा, ताकि किसान खेत में ही अवशेष प्रबंधन कर सकें। इससे न केवल प्रदूषण कम होगा, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी सुधरेगी।
सिंचाई में होगा 160 करोड़ का निवेश
पानी की कमी को देखते हुए ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना के तहत 160 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। इसका मकसद माइक्रो-इरिगेशन तकनीकों को बढ़ावा देना है, जिससे कम पानी में ज्यादा उत्पादन संभव हो सके। यह कदम खास तौर पर उन इलाकों के लिए अहम है जहां भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव शर्मा