हिसार के वैज्ञानिक बनाएंगे प्राकृतिक फूड इमल्सीफायर, गेहूं की पराली से निकलेगा नया समाधान
विश्वविद्यालय के खाद्य प्रौद्योगिकी विभाग को 35 लाख रुपये की शोध परियोजना
स्वीकृत
गेहूं के भूसे से प्राकृतिक फूड इमल्सीफायर विकसित किया जाएगा
हिसार, 12 जून (राजेश्वर बैनीवाल)। खेतों में जलने वाली गेहूं की पराली अब
प्रदूषण का कारण नहीं, बल्कि खाद्य उद्योग के लिए एक मूल्यवान संसाधन बन सकती है। इसी
सोच को साकार करने की दिशा में हिसार स्थित गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हरियाणा राज्य विज्ञान,
नवाचार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (एचएससीएसआईटी) ने विश्वविद्यालय के खाद्य प्रौद्योगिकी
विभाग को 35 लाख रुपये की शोध परियोजना स्वीकृत की है, जिसके तहत गेहूं के भूसे से
प्राकृतिक फूड इमल्सीफायर विकसित किया जाएगा।
‘वेलोराइजेशन ऑफ व्हीट
स्ट्रॉ फॉर द डेवलपमेंट ऑफ नेचुरल इमल्सीफायर: ए सस्टेनेबल सोल्यूशन फॉर एग्रो-वेस्ट
मैनेजमेंट’ शीर्षक वाली इस परियोजना
का नेतृत्व प्रधान अन्वेषक डॉ. उस्मान अली करेंगे। उनके साथ डॉ. सोनिका और इंजीनियर
अंकुर लूथरा सह-अन्वेषक के रूप में कार्य करेंगे।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने शोध टीम को बधाई देते हुए
कहा कि यह परियोजना कृषि अपशिष्ट प्रबंधन और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल
है। उन्होंने कहा कि गेहूं की पराली जैसे कृषि अवशेषों को उपयोगी उत्पादों में बदलना
पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक होगा। उनका मानना है
कि यह शोध हरित प्रौद्योगिकी, खाद्य नवाचार और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूती
प्रदान करेगा।
डॉ. उस्मान अली ने बताया कि भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश
है, जहां हर वर्ष बड़ी मात्रा में कृषि अवशेष उत्पन्न होते हैं। हरियाणा और पंजाब जैसे
राज्यों में गेहूं का भूसा अक्सर खेतों में जला दिया जाता है, जिससे वायु प्रदूषण,
धुंध, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और मिट्टी की उर्वरता में कमी जैसी समस्याएं पैदा
होती हैं। ऐसे में इस परियोजना के माध्यम से पराली को उपयोगी संसाधन में बदलने का प्रयास
किया जाएगा।
शोधकर्ताओं के अनुसार गेहूं का भूसा प्राकृतिक पॉलीसैकेराइड्स, विशेष रूप से
सेल्यूलोज, का समृद्ध स्रोत है। परियोजना के तहत भूसे से सेल्यूलोज निकालकर उसे उन्नत
सेल्यूलोज नैनोफाइबर यानी नैनोसेल्यूलोज में परिवर्तित किया जाएगा। इसके बाद इस नैनोसेल्यूलोज
का उपयोग प्राकृतिक, जैव-आधारित और क्लीन-लेबल फूड इमल्सीफायर के रूप में किया जाएगा।
इमल्सीफायर खाद्य उद्योग में तेल और पानी जैसे तत्वों को एकसमान मिश्रित बनाए
रखने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इनका इस्तेमाल सॉस, ड्रेसिंग, बेकरी उत्पादों और पेय
पदार्थों में व्यापक रूप से होता है। वर्तमान में उद्योग मुख्य रूप से सिंथेटिक या
पशु-आधारित स्थिरकारी पदार्थों पर निर्भर है। ऐसे में पौध-आधारित नैनोसेल्यूलोज इमल्सीफायर
प्राकृतिक खाद्य योजकों की बढ़ती वैश्विक मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभा सकता है।
डॉ. उस्मान अली ने कहा कि इस परियोजना के परिणाम कृषि अपशिष्ट प्रबंधन, टिकाऊ
खाद्य प्रणालियों और जैव-आधारित उत्पादों के विकास में उपयोगी साबित होंगे। यह शोध
किसानों, उद्योगों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए नए अवसर पैदा करेगा तथा हरियाणा
में कृषि अवशेषों के वैज्ञानिक और आर्थिक उपयोग के नए आयाम स्थापित करेगा।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर