वंदे मातरम “एक भारत–श्रेष्ठ भारत” की चेतना का सबसे सशक्त और जीवंत प्रमाण : आशीष सूद
नई दिल्ली, 09 जनवरी (हि.स.)। दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने शुक्रवार को दिल्ली विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के संदर्भ में संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष जी, जिस गीत को उसके 50वें वर्ष में गुलामी ने दबाने का प्रयास किया और 100वें वर्ष में तानाशाही ने कुचल दिया, आज उसी गीत के 150वें वर्ष में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में दिल्ली सरकार पूरे सम्मान और दृढ़ संकल्प के साथ खड़ी है।
शिक्षा मंत्री ने कहा कि अध्यक्ष जी, वंदे मातरम केवल उत्तर भारत का गीत नहीं है। यह केवल बंगाल तक सीमित नहीं है। तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती जी ने इसे अपनाया। महाराष्ट्र में वीर सावरकर जी ने इसे गाया, और पंजाब में क्रांतिकारियों ने इसे जिया। वंदे मातरम “एक भारत–श्रेष्ठ भारत” की चेतना का सबसे सशक्त और जीवंत प्रमाण है। कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि आज सदन में इस विषय पर चर्चा की आवश्यकता क्यों है। अध्यक्ष जी, आवश्यकता इसलिए है क्योंकि इसी विधानसभा के जनादेश से चुनकर संसद पहुंचे कुछ लोग, संसद में बैठकर वंदे मातरम को “गिमिक” कहने का दुस्साहस करते हैं।
शिक्षा मंत्री ने कहा कि अध्यक्ष जी,
“सुजलां सुफलां, मलयज शीतलाम,
शस्य श्यामलां मातरम्।”
हे मां, मैं तुझे प्रणाम करता हूं
तू जल से परिपूर्ण है, फलों से समृद्ध है। शीतल पवनों से सुशोभित है और हरित फसलों से आच्छादित है। यह वही गीत है जिसने विदेशी औपनिवेशिक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष में हमारे हजारों वीर सपूतों को बलिदान की प्रेरणा दी और आज, देश के भीतर बैठकर वैचारिक नस्लवाद और धार्मिक उग्रवाद की खतरनाक साठगांठ चलाने वाले लोग सरजील इमाम, उमर खालिद जैसे तत्वों का समर्थन करते दिखाई देते हैं।
अध्यक्ष जी ये केवल नाम नहीं हैं ये भारत को तोड़ने वाली एक खतरनाक विचारधारा के प्रतीक हैं। दुर्भाग्यवश, इस विचारधारा को संरक्षण देने वाले लोग इस सदन में भी उपस्थित हैं, वे लोग जिन्होंने ऐसे तत्वों के साथ मंच साझा किया है। यह प्रस्ताव, ऐसी विभाजनकारी विचारधाराओं के प्रति सदन की स्पष्ट असहमति और निंदा का प्रतीक है।
“शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीं,
कुलकुसुमित द्रुमदल शोभिनीं…”
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी ने 150 वर्ष पूर्व भारत माता को जिस स्वरूप में चित्रित किया, वह आज भी हमारी राष्ट्रीय चेतना का आधार है।
शिक्षा मंत्री ने कहा कि अध्यक्ष जी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में दिल्ली सरकार ने राष्ट्रनीति करिकुलम के माध्यम से उसी चेतना को विद्यालयों में पुनः स्थापित करने का कार्य किया है ताकि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का संकल्प हमारी युवा पीढ़ी के मन-मस्तिष्क में रोपित हो सके। 1875 में जब वंदे मातरम की रचना हो रही थी, उस समय देश भयानक अकाल से गुजर रहा था, और उसी दौर में दिल्ली में लॉर्ड लिटन का इंपीरियल दरबार आयोजित कर रानी विक्टोरिया को “एम्प्रेस ऑफ इंडिया” घोषित किया गया।
तब भी दरबारी थे आज भी हैं।
तब “गॉड सेव द क्वीन” था, आज भ्रष्टाचार को बचाने वाले शीशमहल हैं।
चेहरे बदले हैं, मानसिकता नहीं।
1925 में इसके 50 वर्ष पूरे हुए तब अंग्रेजों ने वंदे मातरम बोलने पर प्रतिबंध लगाया।
1926 में इसी दिल्ली में, स्वामी श्रद्धानंद जी की निर्मम हत्या कर दी गई केवल इसलिए क्योंकि वे राष्ट्र और शुद्धि आंदोलन से जुड़े थे। 1975 में जब वंदे मातरम के 100 वर्ष पूरे हुए, तब देश में लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया। संविधान निलंबित कर दिया गया वही संविधान जिसे बाबा साहब आंबेडकर ने लिखा था। और आज वही लोग, जो बाबा साहब के नाम का राजनीतिक उपयोग करते हैं, उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या वे बाबा साहब की उस स्पष्ट राय से सहमत हैं, जिसमें उन्होंने वंदे मातरम को छोड़ने की मांग को अनुचित बताया था?
शिक्षा मंत्री ने कहा कि अध्यक्ष जी,
ना चरित्र बदला है,
ना चाल बदली है—
सिर्फ कैलेंडर बदले हैं।
इसीलिए आज वंदे मातरम पर चर्चा आवश्यक है, ताकि दिल्ली की अमृत पीढ़ी को सेवा, संगठन और संस्कार के सूत्र में बांधा जा सके। जातिवाद से तोड़कर, राष्ट्रवाद से जोड़ा जा सके। अध्यक्ष जी, मैं मुख्यमंत्री का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इस ऐतिहासिक चर्चा को विधानसभा के पटल पर स्थान दिया। यह चर्चा केवल युवाओं को प्रेरणा नहीं देती, बल्कि तुष्टीकरण और विघटन की राजनीति का पर्दाफाश भी करती है।
वंदे मातरम।
वंदे मातरम।
भारत माता की जय।
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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव