भारतीय दर्शन के अरूपांतरणीय संस्कृत पदों पर दो दिवसीय कार्यशाला संपन्न

 


नई दिल्ली, 22 अगस्त (हि.स.)। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् (आईसीपीआर), नई दिल्ली एवं भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में 21-22 अगस्त को इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में आयोजित ‘भारतीय दर्शन के अरूपांतरणीय संस्कृत पद’ विषयक दो दिवसीय कार्यशाला शनिवार को संपन्न हुई। कार्यशाला में संस्कृत के दार्शनिक ग्रंथों के अनुवाद, अनुवाद की चुनौतियों तथा ऐसे संस्कृत पदों पर गहन विमर्श हुआ, जिनका अन्य भाषाओं में सटीक रूपांतरण कठिन है।

समापन सत्र में मुख्य अतिथि इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. के. जी. सुरेश ने कहा कि भाषा विचारों को आकार प्रदान करती है और भाषा की शुद्धता से विचारों की स्पष्टता सुनिश्चित की जा सकती है। उन्होंने संस्कृत पदों के अनुवाद में संदर्भ को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि प्रत्येक शब्द के मूल अर्थ को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि कोई शब्द प्रचलित और प्रयोग में है तो उसका अनावश्यक अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए। योग, धर्म, कर्म और ईश्वर जैसे शब्दों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इनका अंग्रेजी में यथार्थ अनुवाद करना कठिन है।

विशिष्ट अतिथि वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. गिरीश नाथ झा ने कहा कि अनुवाद एक कठिन प्रक्रिया है और वैदिक संस्कृत का अनुवाद विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि तकनीकी विकास और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण आज एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद अपेक्षाकृत आसान हुआ है। वर्तमान समय में शब्दावली की बढ़ती मांग को पूरा करने में अनुवाद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् के सदस्य-सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि अनुवाद दुष्कर होने के बावजूद आवश्यक है। संस्कृत में निहित गूढ़ ज्ञान को व्यापक समाज तक पहुंचाने में अनुवाद सहायक हो सकता है। उन्होंने संस्कृत अनुवाद के लिए मानक नियमावली निर्धारित करने पर जोर दिया, ताकि अनुवाद के दौरान होने वाले विवादों से बचा जा सके। उन्होंने कहा कि केवल भाषारूपांतरण की अपेक्षा व्याख्यारूपी अनुवाद अधिक सार्थक हो सकता है।

उद्घाटन सत्र में भारतीय भाषा समिति के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. चामू कृष्ण शास्त्री ने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए संस्कृत ग्रंथों का सही एवं सटीक अनुवाद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संस्कृत ग्रंथ भारतीय चिंतन एवं दर्शन की महान थाती हैं और इनके मूल पाठ का रूपांतरण करते समय अत्यंत सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

कार्यशाला में प्रो. महानंद झा ने कहा कि एक ही संस्कृत शब्द अलग-अलग संदर्भों में भिन्न अर्थ और भाव व्यक्त कर सकता है, इसलिए अनुवाद में संदर्भगत अर्थ-निर्धारण आवश्यक है।

प्रो. भरत नागराजाराव ने प्राचीन काल में संस्कृत ग्रंथों के चीनी भाषा में अनुवाद के दौरान अपनाए गए सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। प्रो. कृष्ण मोहन पांडेय ने कहा कि संस्कृत के अनेक पारिभाषिक एवं दार्शनिक पदों का अंग्रेजी में अनुवाद लगभग असंभव है, क्योंकि उनके अर्थ केवल शब्दार्थ तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे विशिष्ट दार्शनिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदर्भों से जुड़े होते हैं।

प्रो. सम्पदानंदा मिश्र ने कहा कि शब्दात्मक अनुवाद के दौरान विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। शब्द-व्युत्पत्ति को आधार बनाकर अनुवाद के सिद्धांत विकसित किए जाने चाहिए, ताकि अनुवादकों को समान मानक उपलब्ध हो सकें। उन्होंने कहा कि भाषा की नैसर्गिकता बनाए रखने के लिए अरूपांतरणीय शब्द के मूल को समझना जरूरी है।

प्रो. सुदर्शन ने कहा कि भारतीय संस्कृति में एशियाई देशों के सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की क्षमता है। पारंपरिक धार्मिक समुदायों से जुड़ाव स्थापित करने के लिए भारतीय धार्मिक ग्रंथों को अन्य भाषाओं में उपलब्ध कराना आवश्यक है। उन्होंने भारतीय भाषा, वेशभूषा और जीवन-पद्धति पर विदेशी प्रभाव का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय गौरव की भावना को मजबूत करने पर जोर दिया।

कार्यशाला की दो दिवसीय रिपोर्ट भारतीय भाषा समिति के डॉ. गिरिधर राव ने प्रस्तुत की।

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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी