न्यू इंडिया फाउंडेशन की अनुवाद फेलोशिप के लिए मलयालम, हिंदी और उर्दू की चार रचनाओं का चयन

 


नई दिल्ली, 07 जुलाई (हि.स.)। न्यू इंडिया फाउंडेशन (एनआईएफ) ने कड़ी चयन प्रक्रिया के बाद अपनी अनुवाद फेलोशिप के तीसरे दौर के विजेताओं के नामों की घोषणा की। अनुवाद फेलो हैं: मलयालम में जयश्री कलतिल और मिनी चंद्रन, हिंदी में मुरली रंगनाथन और उर्दू में शेफाली झा।

पुरस्कृत द्विभाषी लेखिका और अनुवादक जयश्री कलतिल को आदिवासी भूमि अधिकार कार्यकर्ता सी.के. जानू की आत्मकथा आडिममक्का का अनुवाद करने के लिए फेलोशिप मिली है। यह पुस्तक केरलम में भूमि अधिकारों के लिए आदिवासी आंदोलन का इतिहास है। जानू आदिवासी लोगों के उस राजनीतिक संघर्ष के इतिहास को सामने लाती हैं, जो केरलम के विकास के बहु-चर्चित मॉडल के रिकॉर्ड से नदारद है। कलतिल 'द बॉम्बे' लिटरेरी मैगजीन में अनूदित कथा-साहित्य की मैनेजिंग एडिटर हैं और एएलटीए एमर्जिंग ट्रांसलेटर्स मेंटरशिप प्रोग्राम में मेंटर के तौर पर काम करती हैं।

आईआईटी कानपुर में अंग्रेजी की प्रो. मिनी चंद्रन मशहूर नाटककार तोप्पिल भासी के संस्मरणों पर आधारित पुस्तक ओलीविले ओरमगल का अनुवाद करेंगी। भासी एक प्रमुख मलयालम नाटककार थे, जो अपने नाटक 'निंगलन्ने कम्युनिस्टाक्की' (तुमने मुझे कम्युनिस्ट बना दिया) के लिए सबसे ज़्यादा जाने जाते हैं। इस पुस्तक में सिर्फ पांच साल 1948 से 1953 का समय दर्शाया गया है, फिर भी यह मलयालम की सबसे मशहूर आत्मकथाओं में से एक है।

इतिहासकार, लेखक और अनुवादक मुरली रंगनाथन को राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक तिब्बत में सवा वर्ष के अनुवाद के लिए फेलोशिप प्रदान की गई है। 1934 में प्रकाशित इस पुस्तक में सांकृत्यायन की दिसंबर 1928 से जून 1930 के बीच बुद्ध की खोज में की गई यात्राओं का विवरण है, जो कोलंबो से शुरू होकर वहीं खत्म हुई थीं।

एंथ्रोपोलॉजिस्ट और स्कॉलर शेफाली झा इब्राहिम हुसैन जलीस की किताब दो मुल्क, एक कहानी का उर्दू से अनुवाद करेंगी। आजादी के बाद के दक्षिण एशिया के उथल-पुथल भरे राजनीतिक माहौल को दर्ज करने वाली यह किताब व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित पत्रकारिता के क्षेत्र में एक अहम दस्तावेज है। यह एक युवा उर्दू लेखक और पत्रकार के नजरिए से आजादी पाने के बाद दक्षिण एशिया के निर्माण की अहम घटनाओं का ब्यौरा देती है।

न्यू इंडिया फाउंडेशन गवर्निंग बोर्ड सदस्य नीरजा गोपाल जयाल ने कहा कि इस साल के फेलो आज के भारत में अनुवाद के क्षेत्र में मौजूद असाधारण विद्वता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने जो पुस्तकें चुनी हैं, उनमें आत्मकथा, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और राजनीतिक पत्रकारिता शामिल हैं, और ये भारत के बौद्धिक और सामाजिक इतिहास पर एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं।

उन्होंने बताया कि यह फेलोशिप प्रत्येक फेलो को छह महीने के लिए 6 लाख रुपये का अनुदान देती है ताकि वे दस भारतीय भाषाओं असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, मराठी, मलयालम, ओडिया, तमिल और उर्दू में लिखी गई कथेतर रचनाओं का अनुवाद कर सकें। इस साल इस फेलोशिप के चयन के लिए निर्णायक समिति में एनआईएफ न्यासियों के साथ ही सभी दस भाषाओं की भाषा विशेषज्ञ समितियां थीं, जिनमें प्रतिष्ठित द्विभाषी विद्वान, प्रोफ़ेसर और साहित्यिक अनुवादक शामिल थे।

न्यू इंडिया फाउंडेशन गवर्निंग बोर्ड सदस्य श्रीनाथ राघवन ने कहा कि भारत के बारे में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण किताबें भारतीय भाषाओं में लिखी गई हैं, फिर भी कई किताबें बड़े पाठक-वर्ग तक नहीं पहुंच पाती हैं। अनुवाद फेलोशिप के माध्यम से हम इन बेहतरीन रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद करने में अनुवादकों की मदद करना चाहते हैं, ताकि वे अलग-अलग क्षेत्रों और पीढ़ियों तक पहुंच सकें।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी