जेएनयू में शहरीकरण और आपदा प्रबंधन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न, पर्यावरण संरक्षण और सुशासन पर जोर

 




नई दिल्ली, 09 अक्टूबर (हि.स.)। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के आपदा प्रबंधन विभाग के सभागार में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “शहरीकरण, शासन और आपदा प्रबंधन: उभरती चुनौतियां और नीतिगत प्रतिक्रियाएं” के समापन सत्र में शहरी आपदाओं, पर्यावरण संरक्षण, सुशासन तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ।

संगोष्ठी का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय, मोतीलाल नेहरू कॉलेज (सांध्य), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) के संयुक्त सहयोग से किया गया।

समापन सत्र की अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू कॉलेज (सांध्य) के प्राचार्य प्रो. संदीप गर्ग ने की। सत्र में मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर, वक्ता प्रो. राधे श्याम शर्मा तथा डॉ. दीप नारायण पांडेय उपस्थित रहे।

डॉ. श्याम नारायण पांडेय ने स्वागत वक्तव्य में पूरे दिन सफलतापूर्वक आयोजित 17 से अधिक सत्रों, वक्ताओं, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने संगोष्ठी की सफलता का श्रेय मोतीलाल नेहरू कॉलेज और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संकाय सदस्यों, विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों को दिया।

वक्ता प्रो. राधे श्याम शर्मा ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षरण के कारण आपदाओं की आवृत्ति एवं तीव्रता बढ़ रही है। उन्होंने आपदा जोखिम कम करने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र, आर्द्रभूमियों और पर्यावरण के संरक्षण को आवश्यक बताया। उन्होंने चिकित्सा प्रगति के साथ जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए पर्यावरणीय स्वास्थ्य और सतत विकास पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता रेखांकित की।

मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर ने आपदा प्रबंधन में भारतीय सेना की भूमिका, सामुदायिक सहभागिता और आपदा रोकथाम के महत्त्व पर बल दिया। उन्होंने दिल्ली में पिछले एक वर्ष के दौरान आग और भवन ढहने की 330 घटनाओं तथा अग्निकांडों में 65 प्रतिशत वृद्धि का उल्लेख करते हुए सुरक्षा मानकों के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता बताई। आगामी दशक में भारत की शहरी आबादी 55 करोड़ से अधिक होने की संभावना के संदर्भ में उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, भूकंपरोधी निर्माण और सुनियोजित शहरीकरण पर जोर दिया। उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों से आपदा प्रतिक्रिया तक सीमित रहने के बजाय रोकथाम और एकीकृत शासन व्यवस्था को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. संदीप गर्ग ने सुशासन, पर्यावरणीय स्थिरता और शोध निष्कर्षों को व्यावहारिक कार्रवाई में बदलने पर जोर दिया। उन्होंने भवन निर्माण, सीवेज, जल प्रबंधन और अग्नि सुरक्षा संबंधी नियमों के प्रभावी अनुपालन की आवश्यकता बताई। जापान के भूकंपरोधी निर्माण और नीदरलैंड के बाढ़ प्रबंधन से सीख लेते हुए उन्होंने आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने तथा संगोष्ठी के शोध निष्कर्षों को नीतिनिर्माताओं तक पहुंचाने पर बल दिया।

अंत में डॉ. दीप नारायण पांडेय ने पर्यावरण संरक्षण को केवल वृक्षारोपण तक सीमित न रखकर प्रकृति के प्रति संवेदनशील व्यवहार और स्थानीय पर्यावरण के संरक्षण से जोड़ने की आवश्यकता बताई। उन्होंने विद्यार्थियों को सामूहिक प्रयास, आत्मविश्वास और धैर्य के साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन केवल विचारों और पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार में लागू की जाने वाली जिम्मेदारी है। उन्होंने व्यवस्था की लापरवाही से होने वाली जनहानि पर चिंता व्यक्त करते हुए जिम्मेदार और संवेदनशील कार्यप्रणाली की आवश्यकता रेखांकित की।

संगोष्ठी के समापन पर वक्ताओं ने शोध आधारित सुझावों को प्रभावी नीतियों और ठोस कार्रवाई में बदलने तथा सुरक्षित, पर्यावरण-संवेदनशील और आपदा-रोधी शहरी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी