सीएजी रिपोर्टों ने खोली आआपा सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन और अनियमितताओं की परतें : रेखा गुप्ता

 


नई दिल्ली, 11 अगस्त (हि.स.)। दिल्ली विधानसभा के मॉनसून सत्र के अंतिम दिन मंगलवार को मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सदन में प्रस्तुत सीएजी रिपोर्टों पर चर्चा के दौरान पिछली सरकार के कार्यकाल में सामने आई वित्तीय अनियमितताओं, योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही और सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी को लेकर गंभीर सवाल उठाए। वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद लंबित सीएजी रिपोर्ट्स को सदन में प्रस्तुत किया गया है और अपने लगभग डेढ़ वर्ष के कार्यकाल में 19 सीएजी रिपोर्ट्स विधानसभा में रखी जा चुकी हैं। इन पर लगातार कार्रवाई की जा रही है और पब्लिक अकाऊंट्स कमेटी (पीएसी) भी इनका संज्ञान ले रही है।

उन्होंने कहा कि पिछली सरकार ने किसी भी सेक्टर या विभाग को नहीं छोड़ा। हेल्थ के क्षेत्र में उनके कार्यकाल से जुड़े मामले सामने आए, एजुकेशन के क्षेत्र में गड़बड़ियों की बात सामने आई, विज्ञापन और सब्सिडी से जुड़े विषय सामने आए। इसी प्रकार दिल्ली जल बोर्ड, पीडब्ल्यूडी सहित विभिन्न विभागों में भी अनियमितताओं के मामले सामने आए। स्थिति यह थी कि टेंडर से लेकर सब्सिडी देने तक सभी में गड़बड़ी पाई गई। यह घोटालों की सरकार थी और इस दौरान जनता परेशान होती रही, लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली।

मुख्यमंत्री ने सीएजी रिपोर्ट्स से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू का उल्लेख करते हुए कहा कि विधायकों ने रिपोर्ट्स के कई विषयों पर चर्चा की, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि पिछली सरकार के पास फंड उपलब्ध था, लेकिन उस फंड का भी पूरा उपयोग नहीं किया गया। उन्होंने वित्त वर्ष 2024-25 के फाइनेंशियल बजट का उदाहरण देते हुए कहा कि उस वर्ष 80,798 करोड़ रुपये का बजट था, लेकिन वास्तविक खर्च कितना हुआ, यह विचार करने का विषय है। कुल बजट में से मात्र लगभग 61,000 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए, यानी सरकार के पास उपलब्ध पूरा फंड भी जनता के हित में खर्च नहीं किया गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार से दिल्ली को सब्सिडी और ग्रांट-इन-एड भी मिलती थीं, लेकिन उनका भी अपेक्षित उपयोग नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार को न तो यमुना की सफाई से कोई मतलब था, न कूड़े के पहाड़ हटाने से, न ही दिल्ली की सड़कों को बेहतर बनाने से। प्रदूषण की समस्या भी बनी रही, लेकिन इन विषयों पर कोई प्रभावी जवाबदेही नहीं दिखाई गई। पिछली सरकार के कार्यकाल में पांच साल का चुनावी कार्यकाल समाप्त होने के बाद जनता से फिर कहा जाता था कि एक और पांच साल का मौका दे दीजिए। वादे लगातार किए गए, लेकिन काम अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि कहा कि पिछली सरकार की नीयत में ही खोट था। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि कुल 32 ऐसी योजनाएं थीं, जिनके लिए 1,517 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय प्रस्तावित किया गया था। इन योजनाओं को बजट में शामिल किया गया, उनका ऐलान किया गया, लेकिन जब वास्तविक परिणाम सामने आने का समय आया तो इन योजनाओं पर एक भी रुपया खर्च नहीं किया गया।

मुख्यमंत्री ने दिल्ली मेट्रो के लोन का उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली में मेट्रो आज जीवन का अभिन्न हिस्सा है। केंद्र सरकार लगातार मेट्रो के निर्माण का काम करती रही, लेकिन दिल्ली सरकार ने अपना हिस्सा समय पर नहीं दिया। बजट में फंड उपलब्ध होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं किया गया। पीएम आयुष्मान भारत योजना के तहत केंद्र सरकार की ओर से 150 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए थे ताकि दिल्ली में आयुष्मान केंद्र खोले जा सकें और दिल्ली की जनता के आयुष्मान कार्ड बनाए जा सकें। उन्होंने कहा कि स्कूल ऑफ स्पेशलाइज्ड एक्सीलेंस के लिए 40 करोड़ रुपये की ग्रांट इन ऐड उपलब्ध थी, लेकिन उस पर जीरो एक्सपेंडिचर हुआ।

मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी के लिए भी 39 करोड़ रुपये की ग्रांट इन ऐड उपलब्ध थी, लेकिन उसका भी उपयोग नहीं किया गया। इसके अलावा 34 अन्य योजनाएं ऐसी थीं, जिनके लिए 2,961 करोड़ रुपये की स्वीकृति ले ली गई थी लेकिन आखिरी दिन तक वह फंड खर्च नहीं हुआ।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जनता के पैसे से जुड़े जीएसटी रिफंड के मामले में भी पिछली सरकार का रवैया संतोषजनक नहीं था। उन्होंने आंकड़े देते हुए कहा कि वित्त वर्ष 2024-25 में जीएसटी रिफंड मात्र 695 करोड़ रुपये था। वर्तमान सरकार के आने के बाद वित्त वर्ष 2025-26 में 1,313 करोड़ रुपये का जीएसटी रिफंड दिया गया। उन्होने कहा कि लगभग 19,973 करोड़ रुपये की योजनाओं से संबंधित 1,734 यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट्स लंबित थे, जबकि इनमें से मात्र 482 यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट्स ही सबमिट किए गए। यह स्थिति सरकारी खर्च में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।

मुख्यमंत्री ने बिजली कंपनियों की रेगुलेटरी एसेट से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 के बाद बिजली के टैरिफ में वृद्धि नहीं हुई, जिसके कारण बिजली की खरीद और वितरण से होने वाली वास्तविक आय के बीच अंतर बढ़ता गया। यही अंतर धीरे-धीरे रेगुलेटरी एसेट के रूप में जमा होता गया। मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्ष 2019-20 में यह रेगुलेटरी एसेट करीब 9,000 करोड़ रुपये थी। इसके बाद यह बढ़कर 27,200 करोड़ रुपये हो गई और वर्तमान में यह अंतर लगभग 38,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।

मुख्यमंत्री ने टेंडर प्रक्रिया में सामने आई अनियमितताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि 530 करोड़ रुपये की कुल राशि के 45 टेंडर एक ही पैन कार्ड से किए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी राशि से जुड़े 45 टेंडर एक ही पैन कार्ड के माध्यम से कैसे हो सकते हैं और इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी किस स्तर पर की गई। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से आग्रह किया कि सदन के पटल पर रखी गई सीएजी रिपोर्ट्स और उन पर सदस्यों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों का संज्ञान लेकर आगे की कार्रवाई को गति दी जाए।

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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव