भारत की शक्ति उसकी सभ्यतागत चेतना में निहित : विजेंद्र गुप्ता
नई दिल्ली, 31 मई (हि.स.)। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि भारत की शक्ति केवल उसकी आर्थिक वृद्धि और तकनीकी प्रगति में ही नहीं, बल्कि उसकी सभ्यतागत चेतना, सांस्कृतिक परंपराओं और नैतिक मूल्यों में भी निहित है। इस विरासत का संरक्षण केवल अतीत को स्मरण करने का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य आवश्यकता है। यह विचार विजेंद्र गुप्ता ने आज दिल्ली विश्वविद्यालय स्थित शंकर लाल कॉन्सर्ट हॉल में आयोजित पुस्तक ‘प्रथम सिंधु कुंभ : आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व’ के विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
इस कार्यक्रम का आयोजन सिंधु दर्शन समिति द्वारा किया गया, जिसमें प्रख्यात आध्यात्मिक संतों, विद्वानों, शिक्षाविदों तथा समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम में डॉ. इन्द्रेश कुमार तथा डॉ. दयालु महाराज (अध्यक्ष, हिमालय परिवार, दिल्ली प्रांत) सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि यह अवसर केवल एक पुस्तक के विमोचन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यतागत विरासत, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय आत्मा से पुनः जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है।
विजेंद्र गुप्ता ने सिंधु नदी के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सिंधु केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति और सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि हिंद, हिंदू और हिंदुस्तान जैसे शब्दों की ऐतिहासिक जड़ें भी सिंधु से जुड़ी हुई हैं। उनके अनुसार सिंधु उस निरंतर सभ्यतागत यात्रा का प्रतीक है जिसने सहस्राब्दियों से भारत के स्वरूप और उसकी सांस्कृतिक चेतना को आकार दिया है।
भारत की विविधता में निहित एकता पर बल देते हुए विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि देश में भाषाओं, परंपराओं और जीवन-शैलियों की उल्लेखनीय विविधता होने के बावजूद उसकी सांस्कृतिक आत्मा एक है। उन्होंने कहा कि यही सभ्यतागत एकता भारत की स्थायी शक्ति रही है और सिंधु उसी सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतीक है जो देशवासियों को क्षेत्रों और पीढ़ियों की सीमाओं से परे जोड़ती है।
विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि तीव्र तकनीकी प्रगति और सामाजिक परिवर्तन के इस दौर में युवा पीढ़ी अनेक बार अपनी सांस्कृतिक जड़ों और ऐतिहासिक परंपराओं से दूर होती दिखाई देती है। ऐसे समय में भारत की सभ्यतागत विरासत का दस्तावेजीकरण करने वाली पुस्तकें और सांस्कृतिक पहले ऐतिहासिक स्मृति के संरक्षण, सांस्कृतिक जागरूकता को सुदृढ़ करने तथा राष्ट्र को आकार देने वाले मूल्यों और परंपराओं की गहरी समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रथम सिंधु कुंभ का उल्लेख करते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने इसे समकालीन समाज को आध्यात्मिक चिंतन, सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक समरसता की परंपराओं से पुनः जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि कुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहा है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामूहिक ज्ञान-विमर्श का भी सशक्त मंच रहा है।
विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि यह पुस्तक देश की समृद्ध सभ्यतागत धरोहर के प्रति नई पीढ़ी और समाज में व्यापक रुचि तथा संवाद को प्रेरित करेगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव