मकर संक्रांति 2026: सूर्य उपासना, दान-पुण्य और लोक आस्था का महापर्व
मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, 12 जनवरी (हि.स.)। मकर संक्रांति मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, सूर्य, कृषि, समाज और मानवीय मूल्यों के संतुलन का जीवंत उत्सव है। यह पर्व जिले के जनजीवन में गहराई से रचा-बसा है, जहां आस्था के साथ-साथ सामाजिक चेतना, सहयोग और सामूहिकता का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। मकर संक्रांति जीवन को नई दिशा देने, आत्मचिंतन करने और सामाजिक दायित्वों को समझने का अवसर प्रदान करती है। यह पर्व स्मरण कराता है कि जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा, दान, संयम, करुणा और आत्मशुद्धि भी इसके अभिन्न अंग हैं। वर्ष 2026 में यह महापर्व 14 जनवरी को पूरे जिले में श्रद्धा और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा।
पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में मकर संक्रांति का पुण्य काल दोपहर 3:13 बजे से तथा महा पुण्य काल 3:13 से 4:58 बजे तक रहेगा। मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में किया गया स्नान, दान, सूर्य पूजन और सेवा कार्य अक्षय पुण्य प्रदान करता है। यही कारण है कि जिलेभर में लोग इस समय को विशेष महत्व देते हुए धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।
सूर्य का उत्तरायण गमन: सकारात्मक जीवन का संदेश
मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर गमन का प्रतीक है। उत्तरायण को प्रकाश, ऊर्जा और उन्नति का प्रतीक माना जाता है। यह खगोलीय परिवर्तन जीवन दर्शन से भी जुड़ा है, जो निराशा और नकारात्मकता छोड़कर आशा, परिश्रम और सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा देता है। खरमास की समाप्ति के साथ जिले में नए कार्यों, आयोजनों और सामाजिक गतिविधियों की शुरुआत होती है।
स्नान, सूर्य अर्ध्य और आत्मशुद्धि की परंपरा
मकर संक्रांति पर स्नान का विशेष महत्व है। हसदेव नदी सहित जिले के विभिन्न जल स्रोतों और सरोवरों पर तड़के सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। कड़ाके की ठंड के बावजूद लोग आस्था के साथ स्नान कर सूर्य को अर्ध्य अर्पित करते हैं। यह परंपरा आत्मशुद्धि, अनुशासन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक मानी जाती है।
दान-पुण्य और सामाजिक करुणा का पर्व
मकर संक्रांति दान-पुण्य का महापर्व है। इस दिन तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र और कंबल का दान व्यापक रूप से किया जाता है। तिल पवित्रता और गुड़ मधुरता का प्रतीक है। जिले में जरूरतमंदों, वृद्धजनों और असहायों की सहायता को सामाजिक दायित्व माना जाता है। कई स्थानों पर सामूहिक दान, अन्न वितरण और सेवा कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
कृषि प्रधान जिले में पर्व का विशेष महत्व कृषि प्रधान मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में मकर संक्रांति किसानों के लिए परिश्रम के फल का उत्सव है। नई फसल के आगमन के साथ यह पर्व संतोष और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न करता है। किसान सूर्य और धरती के प्रति आभार प्रकट करते हैं, जो जीवन का आधार हैं।
क्षेत्रवार परंपराएँ और धार्मिक आयोजन
मनेंद्रगढ़ क्षेत्र में सिद्ध बाबा मंदिर प्रमुख आस्था केंद्र रहता है, जहाँ विशेष पूजा, हवन और भंडारे आयोजित होते हैं। चिरमिरी क्षेत्र में मकर संक्रांति सांस्कृतिक उल्लास का पर्व है। नदी तटों व जगन्नाथ मंदिर में पूजा के साथ लोक गीत-नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। भरतपुर क्षेत्र में कैलाश मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर विशेष पूजा, अभिषेक और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है।
हसदेव नदी : आस्था और विश्वास का संगम
हसदेव नदी जिले की जीवनरेखा है। मकर संक्रांति पर सिरौली, आमाखेरवा शिव मंदिर और अमृतधारा हसदेव शिव मंदिर सहित विभिन्न तटों पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। पवित्र स्नान और पूजा-अर्चना के माध्यम से लोग परिवार और समाज की खुशहाली की कामना करते हैं।
जिले में लोक संस्कृति, मेले और सामूहिक उत्सव
गाँव-गाँव में लगने वाले मेले, लोक गीत, नृत्य और पारंपरिक व्यंजन इस पर्व की शोभा बढ़ाते हैं। तिल-गुड़ के लड्डू, खिचड़ी और मौसमी फल सामाजिक मधुरता और आपसी प्रेम का प्रतीक हैं। यह पर्व ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत को सशक्त करता है।
मकर संक्रांति नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का पर्व है। बच्चे और युवा बुजुर्गों से परंपराओं और जीवन मूल्यों की सीख लेते हैं, जिससे सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारस नाथ सिंह