सांसारिक सुख क्षणिक है, जबकि आत्मा का सुख अनंत और शाश्वत है : रत्ननिधि जीमसा

 


धमतरी, 03 अगस्त (हि.स.)। इतवारी बाजार स्थित पार्श्वनाथाय जिनालय में चातुर्मास के अवसर पर रत्ननिधि जीमसा आदि ठाणा-चार के सान्निध्य में आयोजित धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला श्रद्धा और भक्ति के साथ निरंतर जारी है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाएं एवं धर्मप्रेमी श्रद्धालु जिनवाणी का श्रवण कर धर्म लाभ प्राप्त कर रहे हैं तथा स्वाध्याय, तप, संयम और धर्म आराधना के माध्यम से आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर हैं।

प्रवचन के दौरान रत्ननिधि जीमसा ने कहा कि संसार का प्रत्येक पदार्थ नश्वर और परिवर्तनशील है। मनुष्य जिस धन, वैभव, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक सुख-सुविधाओं में सुख खोज रहा है, वह वास्तविक सुख नहीं है। शरीर, परिवार, महल और अपार धन-संपत्ति सहित संसार की हर वस्तु एक दिन नष्ट होने वाली है, इसलिए नश्वर वस्तुओं में स्थायी सुख की कल्पना करना सबसे बड़ा भ्रम है। उन्होंने कहा कि यदि सांसारिक पदार्थों में वास्तविक सुख होता तो भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, भगवान श्रीराम तथा अन्य महापुरुष कभी वैभव और राजसत्ता का त्याग नहीं करते। इन महापुरुषों ने समझ लिया था कि सांसारिक सुख क्षणिक है, जबकि आत्मा का सुख अनंत और शाश्वत है, इसलिए उन्होंने आत्मज्ञान, तप, संयम और साधना का मार्ग अपनाकर मानवता को सच्चे सुख की राह दिखाई।

उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य बाहरी चमक-दमक में इतना खो गया है कि उसने अपने भीतर झांकना ही छोड़ दिया है। जब तक व्यक्ति अपने अंतरमन को नहीं पहचानता, तब तक उसे वास्तविक शांति और आनंद की अनुभूति नहीं हो सकती। जीवन का उद्देश्य केवल धन अर्जित करना नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल बनाना और श्रेष्ठ कर्मों के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाना है। उन्होंने कहा कि चातुर्मास आत्मजागरण और आत्मशुद्धि का महापर्व है, जो स्वयं को बदलने और आत्मचिंतन करने का श्रेष्ठ अवसर प्रदान करता है। जब मनुष्य अपने भीतर के दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक परिवर्तन आता है। रत्ननिधि जी म.सा. ने कहा कि अंतर हृदय की जागृति ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह और ईर्ष्या जैसे विकारों का त्याग कर यदि मनुष्य क्षमा, दया, करुणा, सत्य और अहिंसा को अपनाए, तो उसका जीवन आनंदमय बन सकता है।

उन्होंने समाज से आह्वान किया कि धर्म केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का विषय है। यदि जिनवाणी का एक भी उपदेश व्यवहार में उतर जाए, तो व्यक्ति का जीवन बदल सकता है। उन्होंने परिवारों में धार्मिक और नैतिक संस्कारों का वातावरण विकसित करने पर भी बल दिया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं से चातुर्मास के प्रत्येक दिन का सदुपयोग करते हुए नियमित रूप से प्रवचन, स्वाध्याय, सामायिक, नवकार मंत्र जाप और धर्म आराधना में सहभागी बनने का आह्वान किया गया। उन्होंने कहा कि मनुष्य का वास्तविक धन उसका धर्म है, क्योंकि सांसारिक संपत्ति यहीं रह जाती है, जबकि धर्म और पुण्य ही आत्मा के साथ चलते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा