दीपावली की खुशियां बांटने गली-मोहल्लों में निकली सुआ नृत्य करने वाली टोलियां
छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति की झलक बिखेर रहीं महिलाएं और स्कूली बच्चियां, नृत्य के बदले मिल रहे उपहार
धमतरी, 31 अक्टूबर (हि.स.)। दीपावली पर्व की रौनक अब शहर और गांवों के गली-मोहल्लों में दिखाई देने लगी है। दीपपर्व के आगमन के साथ ही छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकसंस्कृति सुआ नृत्य की गूंज भी सुनाई देने लगी है। इन दिनों महिलाओं और स्कूली बच्चियों की टोलियां घर-घर पहुंचकर पारंपरिक सुआ नृत्य प्रस्तुत कर रही हैं।
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की मधुर धुन और तालियों की थाप पर थिरकती इन टोलियों को देखकर लोगों में भी उत्साह का माहौल है। नृत्य से प्रसन्न होकर लोग उन्हें खुशी-खुशी उपहार और भेंट प्रदान कर रहे हैं। दीपावली खुशियों, उमंग और आपसी मेल-मिलाप का पर्व है। इसकी तैयारियां लगभग पखवाड़े भर पहले ही शुरू हो जाती हैं। इसी के तहत शहर के विभिन्न वार्डों और आसपास के गांवों में सुआ नृत्य करने वाली टोलियां सक्रिय हो गई हैं। शनिवार को अंबेडकर चौक के पास सुआ नृत्य प्रस्तुत कर रही बालिकाओं और महिलाओं ने बताया कि उनकी टोली हर साल दीपावली से पहले नृत्य करने निकलती है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
हालांकि, पहले की तुलना में अब सुआ नृत्य करने वाली टोलियों की संख्या कम हो गई है, लेकिन बच्चों में इसे लेकर खासा उत्साह बना हुआ है। पारंपरिक छत्तीसगढ़ी गीतों पर नृत्य करती बच्चियों की खुशी देखते ही बनती है। धमतरी शहर में स्थानीय टोलियों के अलावा आसपास के गांवों से भी महिलाएं और युवतियां सुआ नृत्य करने पहुंचती हैं। साल के सबसे बड़े त्योहार दीपावली के अवसर पर उन्हें लोगों से अच्छी भेंट मिलने की उम्मीद रहती है। इस तरह सुआ नृत्य के माध्यम से न केवल त्योहार की खुशियां बांटी जा रही हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपरा को भी जीवंत रखा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष छह नवंबर को धनतेरस, आठ नवंबर को दीपावली एवं महालक्ष्मी पूजन, 10 नवंबर को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट महोत्सव, 11 नवंबर को यम द्वितीया एवं भाई दूज तथा 15 नवंबर को सूर्य षष्ठी पूजा मनाई जाएगी।
धन, वैभव एवं सुख-समृद्धि का पर्व है दीपावली
विप्र विद्वत परिषद धमतरी के मीडिया सलाहकार पंडित राजकुमार तिवारी ने बताया कि दीपावली धन, वैभव एवं सुख-समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मां महालक्ष्मी की पूजा-अर्चना का विशेष अवसर है। गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट महोत्सव प्रकृति, गौवंश और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा एवं कृतज्ञता का संदेश देता है। वहीं भाई दूज भाई-बहन के स्नेह और आत्मीयता का प्रतीक है, जबकि सूर्य षष्ठी पूजा में भगवान सूर्य की उपासना की जाती है। इन पर्वों के माध्यम से भारतीय संस्कृति, पारिवारिक संबंधों और धार्मिक परंपराओं की महत्ता भी अभिव्यक्त होती है।
हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा