आदिवासी जमीन के हस्तांतरण में की जा रही नियमों की अनदेखी: आदिवासी समाज
धमतरी, 12 सितंबर (हि.स.)। आदिवासी जमीन को गैर-आदिवासियों के पक्ष में हस्तांतरित किए जाने, भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों के पालन, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से आदिवासी समाज को बाहर रखने, आगामी जनगणना में पृथक आदिवासी धर्म कोड एवं जातिगत जनगणना तथा परिसीमन में आदिवासी क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर सर्व आदिवासी समाज ने शनिवार काे पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में पत्रकारवार्ता की।
पत्रकारवार्ता में पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सर्व आदिवासी समाज के प्रदेशाध्यक्ष अरविंद नेताम, गोंडवाना गोंड महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अकबर राम कोर्राम, कार्यकारी अध्यक्ष बीएस रावटे, जिलाध्यक्ष जीवराखन मरई और कार्यकारी जिलाध्यक्ष महेश रावटे ने विभिन्न मुद्दों पर समाज का पक्ष रखा। जिलाध्यक्ष जीवराखन मरई ने आदिवासी जमीन के गैर-आदिवासियों के पक्ष में हस्तांतरण को लेकर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि भू-माफियाओं के माध्यम से आदिवासी परिवारों की जमीन गैर-आदिवासियों के नाम पर हस्तांतरित कराने के लिए परमिशन की प्रक्रिया कराई जाती है।
उन्होंने आरोप लगाया कि जमीन विक्रय के बाद संबंधित आदिवासी परिवार के पास नियमानुसार पर्याप्त भूमि बच रही है या नहीं, इसका प्रभावी परीक्षण नहीं किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि धमतरी जिले में ऐसे 154 प्रकरण सामने आए हैं, जिनमें गैर-आदिवासियों को आदिवासी भूमि के विक्रय की अनुमति दी गई। इनमें 39 प्रकरण प्रथम दृष्टया नियम विरुद्ध बताए गए हैं। उन्होंने कहा कि अनुमति प्रक्रिया में
नियमों का कड़ाई से पालन हो तो आदिवासी परिवारों को पूरी तरह भूमिहीन होने से बचाया जा सकता है। उनके अनुसार नियमानुसार भूमि विक्रय के बाद संबंधित आदिवासी परिवार के पास पांच एकड़ सिंचित और 10 एकड़ असिंचित भूमि बचना चाहिए। विधानसभा में राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा के जवाब का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासी से गैर-आदिवासी को भूमि विक्रय के बाद भी आदिवासी के पास निर्धारित न्यूनतम भूमि का रहना आवश्यक है। महेश रावटे ने बताया कि शिकायत के बाद राजस्व सचिव ने कमिश्नर को जांच कमेटी गठित करने के लिए पत्र लिखा था, लेकिन अब तक जांच कमेटी गठित नहीं हुई है और मामले में अपेक्षित सुनवाई भी नहीं हुई है।
प्रेसवार्ता में अरविंद नेताम, अकबर राम कोर्राम और बीएस रावटे ने समान नागरिक संहिता से आदिवासी समाज को बाहर रखने की मांग की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, पारिवारिक व्यवस्था, सामाजिक संबंध और जीवन-पद्धति से जुड़ी अपनी प्रथागत एवं रूढ़ीजन्य परंपराएं हैं। इसलिए किसी भी समान कानून को लागू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, प्रथागत व्यवस्थाएं और संवैधानिक संरक्षण प्रभावित न हों। प्रेसवार्ता में रामेश्वर मरकाम, खिलेंद्र पडोटी, हर्ष मरकाम और हेमंत ध्रुव सहित सर्व आदिवासी समाज के पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा