शिक्षकों ने अभ्यावेदन खारिज होने पर सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका
जगदलपुर, 07 नवंबर (हि.स.)। नियुक्ति तिथि से पुरानी पेंशन का लाभ पाने के लिए छत्तीसगढ़ के शिक्षकों की लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। शिक्षाकर्मियों के रूप में वर्षों तक निरंतर सेवा देने के बावजूद पेंशन की पात्रता तय करते समय उनकी पहली नियुक्ति की अवधि को नजरअंदाज किए जाने का मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में उठाया गया है। शिक्षकों की मुख्य मांग है कि 01 जुलाई 2018 को हुए संविलियन से पहले शिक्षाकर्मी के रूप में दी गई उनकी नियमित और निरंतर सेवाओं को भी पेंशन के लिए अर्हता सेवा माना जाए।
इस पूरे विवाद में बिलासपुर हाईकोर्ट की टिप्पणी शिक्षकों के पक्ष का महत्वपूर्ण आधार बनी है। हाईकोर्ट ने अपने पूर्व आदेश में स्पष्ट किया था कि पेंशन कोई खैरात नहीं, बल्कि एक कल्याणकारी उपाय और स्थगित वेतन है। अदालत ने माना था कि संविलियन से पहले वर्षों तक दी गई लंबी सेवा को केवल इस आधार पर अप्रासंगिक नहीं माना जा सकता कि कर्मचारी का शासकीय संविलियन बाद में हुआ है।
छग टीचर्स एसोसिएशन के प्रांताध्यक्ष संजय शर्मा ने शनिवार काे जानकारी देते हुए बताया कि न्यायालय ने शासन को निर्देश दिया था कि वह सेवा की निरंतरता, कार्य की प्रकृति, प्रशासनिक नियंत्रण और संवैधानिक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए 120 दिनों के भीतर एक सचेत एवं कारणयुक्त आदेश जारी करे। लेकिन शासन द्वारा नई नीति बनाने के बजाय पुराने आदेश के आधार पर ही शिक्षकों के अभ्यावेदन खारिज कर दिए गए। इसी फैसले को चुनौती देते हुए शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है।
छग टीचर्स एसोसिएशन के प्रांताध्यक्ष संजय शर्मा, बस्तर संभाग अध्यक्ष प्रवीण श्रीवास्तव एवं बस्तर जिलाध्यक्ष डॉ लुदरसन कश्यप ने नई दिल्ली पहुंचकर वकील से ओपीएस के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा क़र छत्तीसगढ़ शासन के विरुद्ध याचिका दायर की गई है।
अदालत में तर्क दिया है कि यदि पेंशन के लिए सेवा की गणना केवल 01 जुलाई 2018 (संविलियन की तिथि) से की जाती है, तो उन्हें पेंशन की न्यूनतम 10 वर्ष की अर्हता पूरी करने के लिए वर्ष 2028 तक का इंतजार करना पड़ेगा। जबकि इनमें से कई शिक्षक संविलियन से पहले ही राज्य की शिक्षा व्यवस्था में एक दशक से अधिक समय तक सेवाएं दे चुके हैं। ऐसे में पूर्व सेवा को पूरी तरह नजर अंदाज करना न्याय संगतता, समानता और प्रशासनिक तर्कसंगतता के सिद्धांतों के विपरीत है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे