राजपरिवार के सदस्य कमल चंद्र भंजदेव का कथन, मां महालक्ष्मी राजमहल पधारी उनकी अज्ञानता का प्रतीक : राधाकांत पानीग्राही
जगदलपुर, 22 जुलाई (हि.स.)। रियासत कालीन बस्तर गोंचा महापर्व अंतर्गत शताब्दियों पुरानी हेरा पंचमी पूजा विधान की परंपरा का निर्वहन इस वर्ष भी 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के पदेन पाढ़ी एवं पानीग्रही के मार्गदर्शन में संपन्न किया गया।
परंपरानुसार श्री जगन्नाथ मंदिर से महालक्ष्मी की माया स्वरूप दासी की डोली राज परिवार के घर इसके बाद राजगुरु बड़ा में उनके घर एवं अन्य घरों में श्रीजगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्र स्वामी की तलाश करते हुए वापस इस श्रीजगन्नाथ मंदिर पहुंचीं। माता महालक्ष्मी काे सूचित करने की परंपरा का निर्वहन कर भगवान श्रीजगन्नाथ गुंडिचा मंदिर मौसी के घर में विराजमान हैं। इसके बाद महालक्ष्मी की माया स्वरूप दासी की डोली के साथ एक अन्य दूसरी डोली रथ परिक्रमा स्थल से होते हुए गुंडीचा मंदिर पहुंचकर लक्ष्मी-नारायण संवाद की परंपरा संपन्न कराया गया, जिसे हेरा पंचमी पूजा विधान कहा जाता है।
इस संबंध में राजपरिवार के सदस्य कमल चंद्र भंजदेव के द्वारा साेसल मीडिया में यह उल्लेखित करते हुए बताया गया कि मां महालक्ष्मी जी भगवान श्री जगन्नाथ महाप्रभु की खोज में राजमहल पधारी। यह राजपरिवार के सदस्य कमल चंद्र भंजदेव के अज्ञानता को दर्शाता है। कमल चंद्र भंजदेव काे बस्तर गोंचा महापर्व के संबध में शास्त्र-पुराणाें एवं परंराओं का अध्ययन की आश्यकता है। माता महालक्ष्मी के द्वारा भगवान श्रीजगन्नाथ की खाेज में दर-दर भटकने की परंपरा संभव ही नही है, वस्तुत: जहां भगवान विष्णु का वास हाेता है, वहां महालक्षमी विराजमान हाेती है, हेरा पंचमी का विस्तृत वर्णन श्रीमहालक्ष्मी पुराण (ओडिया में 'माणबसा लक्ष्मी पुराण' के रूप में प्रसिद्ध) और चैतन्य चरितामृत में मिलता है। यह उत्सव भगवान श्रीजगन्नाथ और देवी महालक्ष्मी के बीच अनूठे, प्रेमपूर्ण और मानवीय मान-मनौव्वल को दर्शाता है। 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के बस्तर गोंचा महापर्व के जानकाराें में इसे लेकर नाराजगी देखी जा रही है।
360 घर आरण्यक ब्राम्हण समाज के पदेन पानीग्राही राधाकांत पानीग्राही ने बस्तर गाेंचा महापर्व में हेरा पंचमी पूजा विधान के परंपरा के संबध में बताया कि हेरा पंचमी पूजा विधान में महालक्ष्मी की माया स्वरूप दासी भगवान श्रीजगन्नाथ, सुभद्र एवं बलभद्र स्वामी की तलाश करने राज परिवार के घर पंहुचती हैं, जिसके बाद राजगुरु बाडा में उनके घर में नहीं मिलने के पश्चात पूछताछ करके जनकपुरी के समक्ष उनका रथ नंदी घोष को देखते हैं उसके पश्चात श्रीमंदिर लाैटकर महालक्ष्मी को बताते हैं कि प्रभु श्रीजगन्नाथ सुभद्र एवं बलभद्र स्वामी जनकपुरी में अपनी मौसी के घर में है। ततपश्चात महालक्ष्मी की माया स्वरूप दासी के साथ महालक्ष्मी जनकपुरी पंहुुचते हैं, उसके पश्चात महालक्ष्मी-नारायण संवाद होता है। जिसके समस्त पूजा विधान 360 घर आरण्यक ब्राम्हण समाज के पाढ़ी एव पाणिग्राही के द्वारा संपन्न करवाया जाता है। परंपरानुसार पूजा विधान के बाद महालक्ष्मी श्रीमंदिर वापस लाैट जाती है। इस दाैरान महालक्ष्मी की माया स्वरूप दासी के द्वारा प्रभु श्रीजगन्नाथ का रथ नदी घोष को क्षतिग्रस्त करने का निर्वहन किया जाता है।
उन्हाेने बताया कि 360 घर आरण्यक ब्राम्हण समाज के द्वारा बस्तर गाेंचा महापर्व की समस्त पूजा विधान सहित हेरा पंचमी पूजा विधान की परंपरा शास्त्र सम्मत एवं पुुराणाें में उल्लेख के अनुसार संपन्न करवाया जाता है। श्रीजगन्नाथ के गुंडिचा महापर्व (रथ यात्रा) के पांचवें दिन मनाई जाने वाली हेरा पंचमी का विस्तृत वर्णन श्रीमहालक्ष्मी पुराण (ओडिया में 'माणबसा लक्ष्मी पुराण' के रूप में प्रसिद्ध) और चैतन्य चरितामृत में मिलता है। यह उत्सव भगवान श्रीजगन्नाथ और देवी महालक्ष्मी के बीच अनूठे, प्रेमपूर्ण और मानवीय मान-मनौव्वल को दर्शाता है। ओडिया साहित्य में रचित इस पुराण के अनुसार, हेरा पंचमी का विधान और पौराणिक वर्णन इस प्रकार है– गुंडिचा रथयात्रा के दिन भगवान श्रीजगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं, लेकिन देवी महालक्ष्मी को मुख्य मंदिर (श्रीमंदिर) में ही छोड़ देते हैं। कुछ दिन बीत जाने के बाद, महालक्ष्मी को यह अहसास होता है कि उनके स्वामी ने उन्हें अनदेखा कर दिया है, जिससे उनके मन में रोष और वियोग का भाव उत्पन्न होता है। दुखी होकर, माता महालक्ष्मी एक भव्य पालकी में सवार होकर अपने सेवकों के साथ गुंडिचा मंदिर प्रस्थान करती हैं। गुंडिचा मंदिर में महालक्ष्मी-नारायण संवाद होता है, जिसमें माता लक्ष्मीअपनी नाराजगी व्यक्त करती है।
श्रीमहालक्ष्मी पुराण में यह भी उल्लेख है कि अपनी पत्नी के इस प्रचंड क्रोध को शांत करने के लिए, भगवान श्रीजगन्नाथ स्वयं सेवकों के हाथों माता लक्ष्मी को 'आज्ञा माला' (स्वीकृति और प्रेम का प्रतीक माला) भेजते हैं। इसके बाद देवी का क्रोध शांत होता है। गुंडिचा मंदिर से वापसी में देवी महालक्ष्मी मुख्य मार्ग से नहीं, बल्कि 'हेरा गोहिरी साही' नामक एक संकरे और गुप्त मार्ग से श्रीमंदिर लौटती हैं। यह उनके मान और आत्म-सम्मान को दर्शाता।
श्रीमहालक्ष्मी पुराण में यह उल्लेख भी मिलता है कि क्रोध में आकर माता लक्ष्मी के द्वारा भगवान श्रीजगन्नाथ के नंदीघोष (भगवान के रथ) के एक हिस्से को क्षति पंहुचाने का भी उल्लेख मिलता है। वस्तुत: माता लक्ष्मी के द्वारा भगवान श्रीजगन्नाथ के नंदीघोष (भगवान के रथ) को क्षतिग्रस्त नही किया जाता है। महालक्ष्मी की माया स्वरूप दासी के द्वारा भगवान श्रीजगन्नाथ के नंदीघोष (भगवान के रथ)को क्षतिग्रस्त किया जाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे