मानसून से पहले खपरैल घरों की मरम्मत तेज, गांवों में छतों पर लौटी रौनक

 


धमतरी, 13 जून (हि.स.)। मानसून की दस्तक से पहले जिले के ग्रामीण क्षेत्रों और शहर के पुराने वार्डों में खपरैल वाले घरों की मरम्मत का काम तेजी से चल रहा है। सालभर आंधी-तूफान और तेज हवाओं से क्षतिग्रस्त हुई खपरैलों को बदला जा रहा है ताकि बरसात के दौरान घरों की छतों से पानी न टपके। सुबह से शाम तक मिस्त्री और मजदूर खपरैल छाने, पुरानी खपरैल हटाने, नई खपरैल लगाने तथा टूटी कड़ियों की मरम्मत में जुटे हुए हैं।

लोगों की कोशिश है कि पहली बारिश से पहले घर पूरी तरह तैयार हो जाएं, क्योंकि बरसात में छत टपकने से घरेलू सामान और अनाज को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। बदलते दौर में अधिकांश मकान सीमेंट-कंक्रीट और लेंटर वाले बन चुके हैं, लेकिन जिन क्षेत्रों में अब भी मिट्टी और खपरैल वाले घर मौजूद हैं वहां इन दिनों खपरैल पलटने, क्षतिग्रस्त खपरैलों को बदलने और छतों की मरम्मत का कार्य जोर-शोर से जारी है। ग्रामीणों का मानना है कि पारंपरिक मिट्टी और खपरैल के मकान गर्मी के मौसम में अधिक ठंडक प्रदान करते हैं।

ग्राम श्यामतराई के पुसयु साहू ने बताया कि उनके पास पक्का मकान भी है, लेकिन उन्हें खपरैल वाले घर में रहना अधिक पसंद है क्योंकि वहां गर्मी कम लगती है। उनका कहना है कि समय के साथ बदलाव जरूरी है, फिर भी पारंपरिक मिट्टी के मकानों की अपनी अलग विशेषता और आराम है। वर्तमान में खपरैल पलटने का कार्य करने वाले मजदूरों को प्रतिदिन 300 से 400 रुपये तक मजदूरी मिल रही है, जिससे इस काम से जुड़े कारीगरों की मांग बढ़ गई है। दूसरी ओर खपरैल बनाने वाले कुम्हारों का कहना है कि पहले की तुलना में मांग काफी कम हो गई है।

धमतरी के कुंभकार शिवराम कुंभकार ने बताया कि अब खपरैल का उत्पादन मुख्यतः ऑर्डर मिलने पर ही किया जाता है, क्योंकि खरीदारों की संख्या सीमित रह गई है। बावजूद इसके, मानसून से पहले खपरैल और मिट्टी के घरों की मरम्मत का यह पारंपरिक दौर आज भी गांवों की पहचान और संस्कृति को जीवंत बनाए हुए है।

हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा