बलरामपुर : कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को धान की बुवाई और रोपाई के लिए जारी की सलाह
बलरामपुर, 08 जुलाई (हि.स.)। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने खरीफ सीजन को देखते हुए किसानों के लिए जरूरी कृषि सलाह जारी की। वैज्ञानिकों ने कहा कि खेतों में पर्याप्त पानी होने पर नर्सरी तैयार होने के बाद रोपाई करें। वहीं जिन क्षेत्रों में रोपाई संभव नहीं है, वहां अंकुरित बीजों की लेही, ड्रम सीडर या छिटकवा पद्धति से धान की बुवाई करने की सलाह दी गई है।
वैज्ञानिकों ने बुवाई और रोपाई से पहले बीजों का कार्बेन्डाजिम कवकनाशी तथा जैव उर्वरकों से उपचार करने की सलाह दी है, ताकि फसल को शुरुआती बीमारियों से बचाया जा सके और बेहतर उत्पादन प्राप्त हो।
कृषि विज्ञान केंद्र के अनुसार हरेली तिहार तक खरीफ फसलों की बुवाई और रोपाई की जा सकती है। जमीन में नमी की स्थिति होने पर किसान 15 जुलाई तक धान की बुवाई कर लें। वहीं रोपा या बियासी पद्धति अपनाने वाले किसानों को 30 जुलाई तक यह कार्य पूरा करने की सलाह दी गई है।
वैज्ञानिकों ने रासायनिक उर्वरकों के साथ हरी खाद और नील-हरित शैवाल के उपयोग पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि नील-हरित शैवाल के उपयोग से प्रति एकड़ लगभग एक बोरी यूरिया के बराबर नाइट्रोजन प्राप्त होती है, साथ ही मिट्टी की उर्वरता और संरचना में भी सुधार होता है।
अधिक जलभराव वाले खेतों और लगातार बारिश की स्थिति में लेही पद्धति से धान की बुवाई को सबसे उपयुक्त बताया गया है। वैज्ञानिकों ने सीधी बुवाई और बियासी पद्धति के लिए प्रति एकड़ लगभग 30 किलोग्राम, रोपा पद्धति के लिए 20 किलोग्राम तथा हाइब्रिड धान के लिए 6 किलोग्राम बीज का उपयोग करने की सलाह दी है।
बेहतर उत्पादन के लिए किसानों को जल्द और मध्यम अवधि में पकने वाली धान की किस्में, जैसे इंद्रावती, बस्तर धान, छत्तीसगढ़ बरसानी धान, इंदिरा एरोबिक धान, एमटीयू-1010, एमटीयू-1156, विक्रम टीसीआर, छत्तीसगढ़ धान-979 और महामाया अपनाने की सलाह दी गई है। साथ ही बुवाई के बाद शुरुआती 40 दिनों तक खेतों को खरपतवार मुक्त रखने पर विशेष जोर दिया गया।
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हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय