मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के सरपंचों ने ग्राम सभा का किया बहिष्कार
मोहला/रायपुर, 24 जून (हि.स.)। पांचवीं अनुसूची क्षेत्र मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के तीनों विकासखंडों के सरपंचों ने आज ग्राम सभा का बहिष्कार कर दिया है। जिला सरपंच संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र भुआर्य ने बताया है कि पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार की जांच, प्रशासनिक अधिकारियों और सचिवों की मनमानी, तथा ग्राम सभा के प्रस्तावों की अनदेखी किए जाने से नाराज होकर यह कदम उठाया गया है।
सरपंचों ने कहा है कि पंचायतें सभी विभागों के जमीनी कार्यों को संभालती हैं, फिर भी उन्हें उचित सम्मान नहीं मिलता। उन्होंने जिले में “अधिकारी राज” समाप्त करने की बात कही। सरपंचों का कहना था कि वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं और प्रशासन उन्हें आदेश देने की बजाय सम्मानपूर्वक संवाद करे।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समस्याओं का जल्द समाधान नहीं हुआ तो कलेक्टर के खिलाफ व्यापक आंदोलन शुरू किया जाएगा
सरपंचों ने मंगलवार को जिला प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोला । विभिन्न समस्याओं और चार सूत्रीय मांगों को लेकर मंगलवार को जिला मुख्यालय पहुंचे सरपंचों ने जिला पंचायत कार्यालय और कलेक्टर कार्यालय का घेराव करते हुए प्रशासन पर उनकी समस्याओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
जिला सरपंच संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र भुआर्य ने बताया कि जिले भर के सरपंच बिना किसी नारेबाजी के शांतिपूर्ण ढंग से कलेक्टर कार्यालय के बाहर जमीन पर बैठ कर इंतजार कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि कलेक्टर तूलिका प्रजापति उनके सामने से गुजरकर अपने कक्ष में चली गईं, लेकिन उनसे मिलने नहीं आईं। घंटों इंतजार के बाद भी कलेक्टर से मुलाकात नहीं होने पर सरपंचों में भारी नाराजगी देखी गई। उन्होंने प्रशासन के खिलाफ उग्र आंदोलन और सामूहिक इस्तीफे तक की चेतावनी दे डाली। सरपंच संघ के प्रतिनिधि पहले जिला पंचायत सीईओ भारती चंद्राकर से मिलने पहुंचे थे। सरपंचों का आरोप है कि सीईओ ने उनकी बातें पूरी तरह नहीं सुनीं और पंचायत कार्यों, टैक्स कलेक्शन तथा महिला सरपंचों द्वारा अपने पति या पुत्र को कार्यालय लाने जैसी बातों पर दबावपूर्ण तरीके से चर्चा की। इससे नाराज होकर सभी सरपंच कलेक्टर कार्यालय पहुंचे, जहां उन्हें उम्मीद थी कि उनकी समस्याओं का समाधान किया जाएगा।
प्रदर्शन के दौरान सरपंचों ने मनरेगा कार्यों के ऑडिट और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में कथित भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना था कि कई मामलों में दो से पांच प्रतिशत तक कमीशन अग्रिम रूप से देना पड़ता है। कार्य पूरा होने के बाद भी भुगतान के लिए छह महीने से लेकर एक वर्ष तक इंतजार करना पड़ता है।
सरपंचों ने बताया कि भौतिक सत्यापन और मूल्यांकन पूरा होने के बावजूद फाइलों में अलग-अलग त्रुटियां बताकर भुगतान रोका जाता है। उन्हें स्वयं जनपद कार्यालयों में एक टेबल से दूसरी टेबल तक फाइलें लेकर घूमना पड़ता है। एक ही निर्माण कार्य से संबंधित नक्शा, खसरा, प्रस्ताव और अन्य दस्तावेज छह से सात बार तक जमा करवाने पड़ते हैं, फिर भी समय पर निराकरण नहीं होता।
सरपंचों ने अपने मानदेय में वृद्धि की मांग भी उठाई। उनका कहना है कि पंचायतों पर लगातार अतिरिक्त जिम्मेदारियां डाली जा रही हैं, जबकि जनपद और जिला पंचायत स्तर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि शासन की विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन पंचायतों के माध्यम से कराया जाता है, लेकिन जनप्रतिनिधियों को सम्मान नहीं दिया जाता। सरपंचों ने राज्य सरकार के “सुशासन तिहार” कार्यक्रम पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि यह “सुशासन नहीं बल्कि कुशासन तिहार” बन गया है। पंचायतों पर अनावश्यक दबाव डाला जा रहा है और जनता के समय तथा संसाधनों की बर्बादी हो रही है।
हिन्दुस्थान समाचार / केशव केदारनाथ शर्मा