सरगुजा में सियासी और प्रशासनिक घमासान, विधायक की गिरफ्तारी पर अड़े अधिकारी
नायब तहसीलदार ने दी नार्को टेस्ट की चुनौती
अंबिकापुर, 01 जून (हि.स.)। सरगुजा जिले के राजापुर उपतहसील में पदस्थ नायब तहसीलदार तुषार मानिक और सीतापुर के भाजपा विधायक रामकुमार टोप्पो के बीच का विवाद अब एक बेहद दिलचस्प और आक्रामक मोड़ पर पहुंच गया है। विधायक और उनके समर्थकों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर एक जून से सरगुजा
समेत पूरे छत्तीसगढ़ के तहसीलदार और नायब तहसीलदार अनिश्चितकालीन 'कामबंद,
कलमबंद' हड़ताल पर चले गए हैं।
दोनों पक्षों के बीच उपजे इस भारी तनाव के बीच, नायब तहसीलदार ने खुद को बेकसूर साबित करने के लिए शासन के सामने 'नार्को टेस्ट' कराने की खुली चुनौती दे दी है। उनका साफ कहना है कि सच को सामने लाने के लिए पहले उनका स्वयं का, और फिर इसके बाद विधायक, उनकी बहन व शिकायतकर्ता अन्य महिला का नार्को टेस्ट कराया जाए, जिससे 'दूध का दूध और पानी का पानी' हो सके। यह पूरा मामला उस समय प्रदेशस्तर पर गरमा गया जब विधायक और उनके समर्थकों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर 1 जून से सरगुजा समेत पूरे छत्तीसगढ़ के तहसीलदार और नायब तहसीलदार अनिश्चितकालीन 'कामबंद, कलमबंद' हड़ताल पर चले गए हैं, जिससे पूरे राज्य का राजस्व कामकाज ठप होने की कगार पर है।
इस पूरे विवाद की पटकथा बीते 27 अप्रैल को लिखी गई थी, जिसे लेकर नायब तहसीलदार तुषार मानिक ने मीडिया के सामने अपना पक्ष रखा है। उनके अनुसार, विधायक की बहन सीमा धनकी बिना पूरे जरूरी दस्तावेज जमा किए, शोध क्षमता प्रमाण पत्र पर जबरन हस्ताक्षर कराने का दबाव बना रही थीं। अधिकारी का कहना है कि वे एक कठिन परीक्षा पास करके इस संवैधानिक पद पर पहुंचे हैं और नियमों से समझौता नहीं कर सकते। उन पर महिला से बदतमीजी के जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे पूरी तरह निराधार हैं। इसके विपरीत, नायब तहसीलदार ने आरोप लगाया है कि विधायक रामकुमार टोप्पो और उनके समर्थकों ने उनके साथ न सिर्फ मारपीट की, बल्कि उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाते हुए जातिसूचक शब्दों का भी इस्तेमाल किया, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। वर्तमान में स्थिति यह है कि दोनों ही पक्षों की शिकायतों पर पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज कर ली है, लेकिन कार्रवाई न होने से प्रशासनिक अमला बेहद आक्रोशित है।
नायब तहसीलदार ने साफ किया है कि उनकी यह लड़ाई शासन के खिलाफ नहीं है, क्योंकि वे खुद भी शासन का एक अभिन्न अंग हैं, ठीक वैसे ही जैसे विधायक हैं। लेकिन एक जनप्रतिनिधि द्वारा कानून को हाथ में लेकर किया गया ऐसा कृत्य बेहद निंदनीय है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर विधायक बेदाग हैं, तो वे निष्पक्ष जांच का सामना करने से पीछे क्यों हट रहे हैं और उन्होंने अब तक सीतापुर थाने में अपनी गिरफ्तारी क्यों नहीं दी? अधिकारियों के संघ का कहना है कि जब तक विधायक की गिरफ्तारी नहीं हो जाती और इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय मजिस्ट्रेट जांच के आदेश नहीं दिए जाते, तब तक यह आंदोलन जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक उग्र रूप से जारी रहेगा। फिलहाल, इस हाई-प्रोफाइल विवाद ने छत्तीसगढ़ की सियासत और ब्यूरोक्रेसी के बीच एक बड़ी खाई खींच दी है, जिस पर अब पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारस नाथ सिंह