बस्तर दशहरा के मावली परघाव में माता मावली की डोली व छत्र काे मंदिर में किया गया स्थापित
जगदलपुर, 20 अक्टूबर (हि.स.)। रियासत कालीन बस्तर
दशहरा के मावली परघाव में शामिल होने के लिए दंतेवाड़ा से जगदलपुर पहुंची माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी
के छत्र का मंगलवार शाम से भव्य स्वागत का सिलसिला शुरू हुआ। मावली माता की डोली और
दंतेश्वरी के छत्र को जिया डेरा
से दंतेश्वरी मंदिर तक
पहुंचाने में हजारों लोग सड़क के दोनों ओर मौजूद रहे। बस्तर दशहरा के मावली परघाव
में की अगुवानी
राज परिवार के सदस्याें,जनप्रतिनिधियाें एवं ग्रामीणाें ने किया।
बस्तर दशहरा का सबसे महत्वपूर्ण
पूजा विधान मावली परघाव में बस्तर संभाग के 194 गांव के देवी-देवता शामिल हुए। इस दाैरान माता मावली के डाेली के आगे देवी देवताओं के काफिला देखते ही बनती है। परंपरानुसार बस्तर दशहरा के मावली परघाव में भव्य स्वगत के बाद मां दन्तेश्वरी मंदिर में माता मवली की डाेली काे लाकर स्थापित किया गया।
माता
मावली की डोली तथा मां दंतेश्वरी का छत्र बीती रात दंतेवाड़ा से जगदलपुर पंहुचने पर नियत स्थान जिया डेरा में स्थापित
किया गया था। जिसके बाद आज मंगलवार रात्रि में परंपरानुसार मावली परघाव में भव्य स्वगत के बाद मां दन्तेश्वरी मंदिर में लाकर स्थापित किया गया, मां दंतेश्वरी मंदिर में 26 अक्टूबर तक मावली माता की डोली और दंतेश्वरी के छत्र के दर्शन होंगे,
27 अक्टूबर को मावली माता की विदाई के आयोजन के साथ वापस दंतेवाड़ा रवाना
होगी।
मां दंतेश्वरी मंदिर प्रधान पुजारी कृष्ण कुमार पाढी ने बताया कि माता मावली देवी की अगुवानी या स्वागत को स्थानिय बोली में मावली परघाव कहा जाता है।
उन्होने बताया कि मावली
परघाव पूजा विधान
में दंतेवाड़ा
में नए कपड़े में चंदन का लेप से मावली की मूर्ति बनाकर पुष्पाच्छादित किया जाता है। इस मूर्ति
को ही डोली में विराजित कर दंतेवाड़ा से जगदलपुर लाया गया, माता मावली अपने साथ नए अन्न भी लाई है। इस
अन्न से ही बस्तर राजपरिवार
कुम्हड़ाकोट जंगल में साेमवार 22 अक्टूबर को
नवाखानी त्यौहार मनाएगा।
हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे