नक्सलवाद के खात्में के बाद पहली बार अबूझमाड़ के सतवा में श्रीगणेश की हुई स्थापना
नारायणपुर, 17 सितंबर (हि.स.)। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में स्थित ग्राम सतवा में इस वर्ष श्रीगणेश चतुर्थी का पर्व एक नई उम्मीद और बदलाव का संदेश लेकर आया। ग्राम सतवा के इतिहास में पहली बार ग्रामीणों ने मिलकर भगवान श्रीगणेश की विधि-विधान से स्थापना की गई है।
कभी नक्सल दहशत और अंदरूनी इलाका होने के कारण जहां त्योहारों के आयोजन और सार्वजनिक उत्सव की कल्पना करना भी मुश्किल माना जाता था, वहीं अब ग्रामीणों ने उत्साह के साथ गणेश उत्सव की शुरुआत कर एक नई पहल की है। ग्रामीणों के अनुसार उन्होंने इससे पहले श्रीगणेश उत्सव को टीवी और मोबाइल फोन पर ही देखा था। गांव में पहली बार सार्वजनिक रूप से भगवान श्रीगणेश की स्थापना होना उनके लिए भावनात्मक और यादगार अवसर है। ग्रामीणों का कहना है कि यह आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव में आपसी एकता, भाईचारे और उत्साह को भी बढ़ा रहा है। ग्राम सतवा में गणेश उत्सव का आयोजन क्षेत्र में बदलते माहौल की तस्वीर भी सामने रखता है।
ग्रामीणों ने स्वयं आपस में चंदा एकत्र किया और गांव में एक छोटा-सा गणेश पंडाल तैयार कर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित किया। पंडाल को केले के पत्तों, रंग-बिरंगे कागज और फूलों से सजाया गया है। गणेश प्रतिमा की स्थापना के बाद से ही गांव में धार्मिक माहौल बना हुआ है। प्रतिदिन सुबह और शाम आरती के साथ भजन-कीर्तन का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा उत्साहपूर्वक शामिल हो रहे हैं। लंबे समय तक नक्सल प्रभाव और दहशत से प्रभावित रहे अंदरूनी क्षेत्रों में सुरक्षा, प्रशासनिक पहुंच और विकास गतिविधियों के साथ ग्रामीणों में सार्वजनिक जीवन को लेकर विश्वास बढ़ने की तस्वीर दिखाई दे रही है। अब ग्रामीण अपने पारंपरिक और धार्मिक पर्वों को सामूहिक रूप से मनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
गणेश पंडाल में बच्चों की विशेष भागीदारी देखने को मिल रही है। सुबह-शाम होने वाली आरती और भजन-कीर्तन में ग्रामीण एक साथ जुट रहे हैं। इससे गांव में उत्सव का माहौल बना हुआ है और लोगों के बीच मेल-जोल भी बढ़ा है। ग्राम सतवा में पहली बार गणेश स्थापना को ग्रामीण क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। गणपित की आरती के बीच गूंजता ‘गणपति बप्पा मोरया’ का जयघोष अबूझमाड़ के इस अंदरूनी गांव में नई उम्मीद, आस्था और सामान्य जनजीवन की ओर बढ़ते कदमों का प्रतीक बनकर सामने आया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे