कोरबा : धमनागुड़ी और खरहरी में 200 वर्षों से नहीं मनाई जाती होली, अनहोनी की आशंका से जुड़ी है परंपरा

 






कोरबा, 02 मार्च (हि. स.)। रंगों का त्योहार होली जहां पूरे देश में हर्षोल्लास, गुलाल और होलिका दहन के साथ मनाया जाता है, वहीं कोरबा जिले के धमनागुड़ी और खरहरी गांवों में इसकी तस्वीर बिल्कुल अलग है। यहां पिछले लगभग 200 वर्षों से भी ऊपर हो गए तब से न तो होलिका दहन किया जाता है और न ही रंग-गुलाल खेला जाता है। ग्रामीणों का दावा है कि होली मनाने से गांव में अनहोनी की आशंका बनी रहती है, इसलिए पूर्वजों की परंपरा को आज तक कायम रखा गया है।

ग्रामीणों के अनुसार, यह व्यवस्था उनके बुजुर्गों की मान्यता और आस्था से जुड़ी हुई है। होली के दिन गांव में शांति और श्रद्धा के साथ पूजा-पाठ किया जाता है, लेकिन अग्नि प्रज्वलन की परंपरा नहीं निभाई जाती। गांव के लोग पर्व का महत्व स्वीकार करते हैं, परंतु पारंपरिक होलिका दहन और रंगों का उत्सव नहीं मनाते।

धमनागुड़ी निवासी गनपत सिंह कंवर बताते हैं कि उनकी उम्र लगभग 75 वर्ष है और उन्होंने अपने जीवन में गांव में कभी होली खेलते नहीं देखा। उनके अनुसार करीब एक सदी से अधिक समय से गांव में रंग-गुलाल और होलिका दहन की परंपरा बंद है, हालांकि श्रद्धा और धार्मिक अनुष्ठान जारी रहते हैं।

खरहरी निवासी तामेश्वर सिंह पैकरा के मुताबिक, करीब नौ वर्ष पहले एक परिवार ने होली मनाने का प्रयास किया था। रंग-गुलाल खेलने के कुछ समय बाद उनके घर में आग लग गई, जिससे गांव में दहशत फैल गई। इस घटना के बाद ग्रामीणों का विश्वास और मजबूत हो गया कि होली खेलने से अनिष्ट हो सकता है। तब से गांव में फिर किसी ने होली मनाने की पहल नहीं की।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि कोई व्यक्ति बाहर जाकर होली खेलकर लौटता है, तो गांव में प्रवेश से पहले उससे रंग खेलने के बारे में पूछताछ की जाती है। यह परंपरा गांव की सुरक्षा और सामूहिक चेतावनी की भावना से जुड़ी मानी जाती है।

धमनागुड़ी और खरहरी की यह अनोखी परंपरा क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी रहती है। यह उदाहरण दर्शाता है कि त्योहारों की परंपराएं स्थानीय मान्यताओं और विश्वासों के अनुसार बदल सकती हैं, जहां उत्सव से अधिक शांति, आस्था और सामुदायिक एकजुटता को प्राथमिकता दी जाती है।

हिन्दुस्थान समाचार / हरीश तिवारी