डिजिटल जीवन शैली ने हरेली व नागपंचमी की कुश्ती काे विलुप्त होती परंपरा की श्रेणी में पहुंचाया
जगदलपुर, 17 अगस्त (हि.स.)। बस्तर में सावन की फुहार के साथ हरेली तिहार बस्तर दशहरा के परंपरा तक सीमित है वहीं नागपंचमी काे औपचारिक रूप से मनाया जा रहा है। गली मुहल्लाें में हाेने वाली कुश्ती की प्रतियाेगिता बंद हाे चुके हैं, अखाड़े विलुप्त हाे चुके हैं। नारियल फेंक प्रतियोगिता, गेंड़ी दौड़ की प्रतियाेगिताएं समाप्त हाे गये हैं। आधुनिकता और डिजिटल जीवन शैली ने माटी की इस विरासत को इतिहास के पन्नों तक सीमित करने की ओर अग्रसर है।
हरेली सिर्फ त्योहार नही किसान और प्रकृति का रिश्ता है। नागपंचमी भी पूजा नहीं, मनुष्य और जीव- जंतु के सह आस्तित्व का संदेश है। अगर समय रहते इन खेलों, अनुष्ठानों को नही बचाया गया तो आने वाली पीढ़ी हरेली को सिर्फ छुट्टी और नागपंचमी को सिर्फ गोबर के नाग की पूजा समझेगी। सरकार और समाज को चाहिए कि हर पंचायत और स्कूल में हरेली पर नारियल फेंक व गेंड़ी प्रतियोगिता अवश्य हो, नागपंचमी में प्रत्येक स्कूलाें में कुश्ती की प्रतियाेगिता करवाये जायें, साथ ही पाठ्यक्रम में छत्तीसगढ़ के लोक पर्वों को जगह दी जाए। वरना हरेली और नागपंचमी दोनों विलुप्त हाे चुकी परंपराओं की श्रेणी में सूचिबद्ध हाेने से नही बचाया जा सकेगा।
बस्तर में पहले इस पर्व के दिन खेत के सभी औजार हल, कुदाल, फावड़ा, गेंती, ट्रैक्टर को धोकर रंग- गेरू लगाकर पूजा होती थी। घर मे चांवल के चीला, खुरमी, ठेठरी बनते थे। चौक- चौराहे पर युवाओं की टोली नारियल फेंक प्रतियोगिता करती थे और बच्चे बांस की गेंड़ी पर दौड़ लगाते थे। इस प्रकार पूरे गांव में उत्साह का मेला लगता था। लेकिन आज के दौर में सिर्फ औपचारिकता मात्र बच गया। किसान औजार धोकर पूजा कर लेते हैं। कुछ घरों में पकवान बनते हैं। नारियल फेंक और गेंड़ी की आवाज अब सुनाई नही देती। उसकी जगह बच्चों के हाथों में मोबाइल और युवाओं के हाथ मे रील और नशा है।
सावन में मनाया जाने वाला नागपंचमी ताे दम तोड़ रहा है। मान्यता है कि धरती को नागदेव ने अपने फन पर उठा रखा है, इसलिए साल में एक बार उनकी पूजा होती है। पहले घर- घर महिलाएं गोबर और गेरू से दीवारों पर नाग बनाती और उस पर कुमकुम लगाकर पूजा करती थी। सपेरे बीन बजाते हुए जीवित नागों के साथ घर- घर दर्शन कराने आते थे। डर के साथ श्रद्धा भी होती थी। अब सिर्फ मुख्य द्वार पर गोबर का नाग बना दिया जाता है। ऐसे में विलुप्त होती इन परंपरा को सहेजने की आवश्यकता है।
बुजुर्गों का कहना है कि अब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, त्योहार मनाने के लिए टोली नहीं बनती, बच्चें अब गेंड़ी की जगह गेम खेलते व लोकगीत की जगह रील देखते हैं। वर्तमान दौर में नई पीढ़ी को स्कूलों में हरेली- नागपंचमी के महत्व ही नहीं पढ़ाया जाता, इसलिए वो इसे बैकवर्ड मानने लगे हैं। बुजुर्गों का मानना है कि हम मर जाएंगे तो ये पारंपरिक पर्व भी मर जाएंगे। सरकार स्कूल में पढ़ाती है अकबर- बीरबल, लेकिन हरेली- नागपंचमी के महत्व काे नहीं बताती।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे