धमतरी मॉडल बना देश के लिए प्रेरणा: औषधीय खेती से महिलाओं की आर्थिक क्रांति, 500 एकड़ विस्तार का लक्ष्य

 




धमतरी, 20 जुलाई (हि.स.)। जहां कभी अनुपयोगी और बंजर मानी जाने वाली जमीन थी, वहां आज औषधीय एवं सुगंधीय फसलों की हरियाली लहलहा रही है। धमतरी जिले में महिलाओं ने पारंपरिक खेती की सीमाओं को तोड़ते हुए औषधीय खेती के माध्यम से आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की है।

ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, कृषि नवाचार और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग का यह मॉडल अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है। इन दिनों कुरूद विकासखंड के कोटगांव और पचपेड़ी में औषधीय पौधों की नर्सरी विकसित की जा रही है, वहीं भविष्य में आवश्यक तेल निष्कर्षण, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन की दिशा में भी कार्य किया जाएगा, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।

धान आधारित खेती वाले इस जिले में सीमित आय, प्राकृतिक जोखिम और अनुपयोगी भूमि की चुनौती को अवसर में बदलते हुए जिला प्रशासन ने वर्ष 2025 में कलेक्टर अबिनाश मिश्रा के मार्गदर्शन में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) और राज्य औषधीय पादप बोर्ड के सहयोग से औषधीय एवं सुगंधीय फसलों के कृषिकरण की अभिनव पहल शुरू की। इस अभियान का उद्देश्य केवल खेती को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि महिला स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाकर ग्रामीण आजीविका को नई दिशा देना था। विस्तृत सर्वेक्षण के बाद रेतीली, कम उत्पादक और अनुपयोगी भूमि की पहचान कर वहां खस, ब्राह्मी, बच, लेमनग्रास, पामारोजा और पचौली जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों की खेती शुरू कराई गई।

महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री, तकनीकी प्रशिक्षण, विशेषज्ञों का मार्गदर्शन और शत-प्रतिशत बाय-बैक की सुविधा उपलब्ध कराई गई, जिससे विपणन की चिंता पूरी तरह समाप्त हो गई। पहले चरण में करीब 150 एकड़ क्षेत्र में 200 महिला स्व-सहायता समूह की सदस्यों को जोड़ा गया। इनमें लगभग 80 एकड़ में खस, 20 एकड़ में ब्राह्मी, 10 एकड़ में बच तथा 40 एकड़ में लेमनग्रास, पामारोजा और पचौली की खेती की गई। परिणामस्वरूप पहले अनुपयोगी मानी जाने वाली भूमि से प्रति एकड़ लगभग एक लाख रुपये तक की आय होने लगी। इस अतिरिक्त आय से महिलाओं ने बच्चों की शिक्षा, कृषि उपकरणों की खरीद, छोटे व्यवसाय और परिवार की जरूरतों को पूरा कर आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की। आदर्श महिला कृषक समूह कंडेल की सत्या ढीमर बताती हैं कि पहले वे केवल धान की खेती पर निर्भर थीं, लेकिन औषधीय खेती ने उनकी आय कई गुना बढ़ा दी।

पूना साहू और कुंती ढीमर का कहना है कि इस योजना ने महिलाओं को केवल आर्थिक मजबूती ही नहीं, बल्कि निर्णय लेने और उद्यमिता की नई पहचान भी दी है। किसान अशोक नेताम के अनुसार कम पानी वाली भूमि में लेमनग्रास और खस जैसी फसलें बेहद लाभदायक साबित हुई हैं, जिससे अब जिले के अनेक किसान पारंपरिक खेती के साथ औषधीय खेती को भी अपना रहे हैं। राज्य सरकार के 'लखपति दीदी' अभियान को भी इस पहल से नई गति मिली है, जिसमें महिला स्व-सहायता समूहों को स्वरोजगार और उद्यमिता से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। धमतरी मॉडल की विशेषता केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी वैल्यू चेन विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

औषधीय खेती को राष्ट्रीय सम्मान भी मिल चुका है

धमतरी के इस नवाचार को नौ दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित महाकुंभ-2025 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और कृषि जागरण के संयुक्त मंच पर राष्ट्रीय सम्मान भी मिल चुका है। इसके बाद हैदराबाद, बिहार, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों के किसान, अधिकारी और संस्थाएं इस मॉडल का अध्ययन करने धमतरी पहुंच रहे हैं। प्रथम चरण की सफलता के बाद अब इस परियोजना का विस्तार 500 एकड़ तक करने और 500 से अधिक महिलाओं को 'लखपति दीदी' बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। राज्य औषधीय पादप बोर्ड, कृषि विभाग, उद्यानिकी विभाग और बिहान के संयुक्त प्रयासों से जिले के सभी विकासखंडों में प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता दी जा रही है। आर्थिक लाभ के साथ-साथ औषधीय खेती पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन, भूमि संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा दे रही है।

हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा