चित्रकोट जल प्रपात के नीचे 90 फीट की गहराई में इंद्रावती नदी गढ़ती है प्राकृतिक शिवलिंग
जगदलपुर, 04 अगस्त (हि.स.)। बस्तर की प्राणदायिनी इंद्रावती के किनारे बसे चंदेला, ककनर, तीरथा, घुमरमुंडपारा चित्रकोट के ग्रामीण शिव आराधना तो करते हैं, वहीं इंद्रावती नदी से संग्रहित प्रकृतिक शिवलिंग से बस्तर सहित आस-पास के नगरों में सैकड़ाे शिवालय बन चुके हैं। संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से 39 किमी दूर चित्रकोट जल प्रपात के नीचे करीब 90 फीट की गहराई में सैकडों वर्षों तक शिला-खंडों के आपस में घर्षण से गोल-अंडाकार प्रकृतिक शिवलिंग का निर्माण होता है। जब नदी में बाढ़ आती है, तो पानी के वेग में यह प्रकृतिक शिवलिंग घाटी में दूर तक बिखर जाती हैं।
कुडक जाति के मछुआरे नदी से प्रकृतिक शिवलिंग एकत्र करते हैं और इन्हें तुलसी चौरा जैसे पवित्र स्थान पर सुरक्षित रखते हैं। जैसे ही कोई शिवभक्त प्रकृतिक शिवलिंग तलाशते हुए यहां पहुंचता है। ग्रामीण बड़े आदर के साथ उनके पसंद की प्रकृतिक शिवलिंग देते हैं। ग्राम चंदेला से हीराराम बताते हैं कि हम किसी से रूपये-पैसे मांगते नहीं। शिवालय बनाने वाले यह कहते है, कि पूजा पाठ का कोई भी सामान मुफ्त में नहीं लेना चाहिए, और वे दक्षिणा स्वरूप धोती-रूपये छोड़ जाते हैं।
धूमरमुंड पारा के महेश कुडूक का कहना है कि हजारों शिवभक्त घुमरमुंड पारा चित्रकोट, तिरथा, ककनार, भेजा, चंदेला आदि स्थानों से प्रकृतिक शिवलिंग ले जा चुके हैं। इंद्रावती से प्राप्त प्रकृतिक शिवलिंग को बस्तर के सैकड़ाे शिवालयों में स्थापित किया जा चुका है। आज भी ओडिशा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र के अलावा छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों से लोग चित्रकोट आते हैं और श्रद्धाभाव से प्रकृतिक शिवलिंग ले जाते हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे