मन को स्थिर करना ही सुखी जीवन की कुंजी: रत्ननिधि

 




पार्श्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में प्रवचन जारी

धमतरी, 26 अगस्त (हि.स.)। धर्मनगरी धमतरी के पार्श्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास के दौरान धर्मसभा एवं विभिन्न धार्मिक आयोजन श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हो रहे हैं।

धर्मसभा में रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने “मन को स्थिर करना ही सुखी जीवन की कुंजी” विषय पर प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी समस्या बाहरी परिस्थितियां नहीं, बल्कि मन की चंचलता है। मन कभी अतीत की यादों में तो कभी भविष्य की चिंता में भटकता रहता है, जिसके कारण व्यक्ति वर्तमान में रहते हुए भी शांति का अनुभव नहीं कर पाता।

उन्होंने कहा कि मन शांत हो तो साधारण जीवन भी सुखमय लगता है, जबकि मन अशांत हो तो सुविधाओं के बावजूद बेचैनी बनी रहती है। मन को नियंत्रित करने के लिए आत्मचिंतन, स्वाध्याय, ध्यान और प्रभु स्मरण को जीवन का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां हमेशा हमारे अनुसार नहीं चलेंगी, लेकिन उनके प्रति हमारी प्रतिक्रिया हमारे हाथ में है।

प्रवचन में चिंता के बजाय चिंतन अपनाने का संदेश देते हुए कहा गया कि बीते समय का पछतावा और भविष्य की चिंता मन की शांति छीन लेते हैं, इसलिए वर्तमान को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने क्रोध को मन की स्थिरता का बड़ा बाधक बताते हुए मौन, धैर्य और क्षमा का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि दूसरों से तुलना करने पर ईर्ष्या और असंतोष बढ़ता है, जबकि संतोष जीवन का सबसे बड़ा धन है। प्रतिदिन कुछ समय मौन, प्रभु स्मरण, धार्मिक साहित्य के अध्ययन और आत्मनिरीक्षण के लिए निकालने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि मन को अच्छे विचारों से जोड़ने पर वही मन आत्मकल्याण का साधन बन सकता है। उन्होंने कहा कि परिवर्तन की शुरुआत मन से होती है; विचार बदलेंगे तो व्यवहार, कर्म और जीवन की दिशा भी बदलेगी। प्रवचन के समापन पर उन्होंने कहा कि सुखी जीवन का रहस्य अधिक पाने में नहीं, बल्कि मन को स्थिर और संतुष्ट रखने में है। धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने भावपूर्वक प्रवचन का श्रवण किया और मन की शांति, आत्मचिंतन, ध्यान, स्वाध्याय, क्षमा, संतोष एवं संयम को जीवन में अपनाने की प्रेरणा ली।

हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा