गौरलाटा की 1225 मीटर ऊंची चोटी पर लहराया तिरंगा, दुर्गम रास्तों को पार कर पहुंचे पुलिस जवान और ग्रामीण

 


बलरामपुर, 15 अगस्त (हि.स.)।स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देशभक्ति का एक अलग नजारा बलरामपुर जिले के चांदो वन परिक्षेत्र के घने जंगलों में देखने को मिला। छत्तीसगढ़ और झारखंड की सीमा से लगे क्षेत्र में स्थित राज्य की सबसे ऊंची चोटी गौरलाटा पर पुलिस जवानों और ग्रामीणों ने ध्वजारोहण कर स्वतंत्रता दिवस मनाया। करीब 1225 मीटर की ऊंचाई पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए टीम को आसान रास्ता नहीं मिला। दुर्गम पहाड़ी मार्ग, चट्टानों, नदी-नालों और घने जंगलों से होकर करीब दो घंटे पैदल चलने के बाद टीम चोटी तक पहुंची।

गौरलाटा तक पहुंचना सामान्य पहाड़ी यात्रा जैसा नहीं है। रास्ते में कई स्थानों पर बड़ी चट्टानों के बीच से गुजरना पड़ता है। जंगल के बीच नदी और छोटे-बड़े नाले भी रास्ते में आते हैं। इसके अलावा जंगली जीव-जंतुओं का खतरा भी बना रहता है। ऐसे चुनौतीपूर्ण हालात के बावजूद पुलिस जवानों और ग्रामीणों ने पीछे हटने के बजाय आगे बढ़ने का फैसला किया।

पुलिस जवान मिथिलेश पाठक के नेतृत्व में टीम ने पैदल यात्रा शुरू की। लगातार करीब दो घंटे तक कठिन रास्ते पर चलने के बाद सभी गौरलाटा की ऊंची चोटी पर पहुंचे। वहां पहुंचकर ध्वजारोहण किया गया। तिरंगा लहराते ही पूरा क्षेत्र देशभक्ति के नारों से गूंज उठा।

गौरलाटा बलरामपुर जिले के चांदो वन परिक्षेत्र में छत्तीसगढ़-झारखंड सीमा के नजदीक घने जंगलों के बीच स्थित है। इसकी ऊंचाई समुद्र तल से करीब 1225 मीटर बताई जाती है। इसे छत्तीसगढ़ की सबसे ऊंची चोटी माना जाता है।

गौरलाटा के बाद राज्य की ऊंची पहाड़ियों में मैनपाट का नाम आता है, जिसकी ऊंचाई करीब 1152 मीटर है। गौरलाटा का नाम सामान्य ज्ञान और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी छत्तीसगढ़ की सबसे ऊंची चोटी के रूप में पूछा जाता है।

गौरलाटा और इसके आसपास का वन क्षेत्र एक समय नक्सल गतिविधियों से प्रभावित रहा है। घने जंगल और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस इलाके में सुरक्षा के लिहाज से भी चुनौतियां रही हैं। ऐसे क्षेत्र में स्वतंत्रता दिवस पर पुलिस जवानों और ग्रामीणों का एक साथ चोटी तक पहुंचकर तिरंगा फहराना स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण संदेश देता है।

यह आयोजन केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दुर्गम क्षेत्र में पुलिस और ग्रामीणों के बीच सहयोग तथा विश्वास को भी सामने लाया।

छत्तीसगढ़ की सबसे ऊंची चोटी होने के बावजूद गौरलाटा अभी भी आम लोगों की पहुंच से काफी दूर है। इसका एक बड़ा कारण इस स्थान के बारे में सीमित जानकारी और यहां तक पहुंचने के लिए सुविधाजनक रास्ते का अभाव है। आसपास के ग्रामीण इस पहाड़ी और इसके रास्तों से परिचित हैं, लेकिन राज्य के दूसरे हिस्सों से आने वाले पर्यटकों के लिए यह जगह अब भी अनजानी है।

गौरलाटा में प्राकृतिक पर्यटन की काफी संभावनाएं मौजूद हैं। घने जंगल, पहाड़ी भू-दृश्य, ऊंचाई से दिखाई देने वाला आसपास का क्षेत्र और दुर्गम रास्ते इसे साहसिक पर्यटन के लिए भी आकर्षक बना सकते हैं। यदि भविष्य में प्रशासन की ओर से सुरक्षित पहुंच मार्ग, आवश्यक सुविधाएं और पर्यटकों के लिए उचित व्यवस्थाएं विकसित की जाती हैं तो गौरलाटा को पर्यटन स्थल के रूप में पहचान मिल सकती है।

स्वतंत्रता दिवस पर गौरलाटा की चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराने की तस्वीर इस क्षेत्र की बदलती पहचान को भी सामने लाती है। कभी नक्सल गतिविधियों के कारण चर्चा में रहने वाला यह इलाका अब अपनी प्राकृतिक सुंदरता और राज्य की सबसे ऊंची चोटी के कारण पहचाना जा सकता है।

1225 मीटर की ऊंचाई पर लहराता तिरंगा केवल स्वतंत्रता दिवस का उत्सव नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि दुर्गम से दुर्गम स्थान तक देश की आन, बान और शान पहुंच सकती है। यदि गौरलाटा को योजनाबद्ध तरीके से पर्यटन के नक्शे पर विकसित किया जाए तो आने वाले समय में यह बलरामपुर ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए एक प्रमुख प्राकृतिक और साहसिक पर्यटन स्थल बन सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय